मनहरण घनाक्षरी भारत की शान लाल, पैंसठ का शुभ साल , विचार जीवन सादा कभी ना भुलायेंगे।। *समृद्ध किसान नारा*,*सैनिक भी लगे प्यारा* , सादगी जीवन भर, गुणगान गाएंगे।। भारत के रत्न आप, कद काठी मत नाप , देश पर सब वारा, मस्तक झुकाएंगे।। इरादे बुलंद भले, अभावों में बढ़े पले, याद कर आज सभी, उत्सव मनायेंगे।। पूनम शुक्ला
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Showing posts from December, 2021
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छंद दोहे 1/10/21 नीयत हो उत्तम सदा , बनों नेक इंसान। नहीं फसे जंजाल में, बनती है पहचान।। जन्म मृत्यु से तार दो, विनय करुँ भगवान। जी का है जंजाल ये, होता नहीं निदान ।। मन में अब संतोष रख, देना ना कुछ ध्यान। छोड़ जगत जंजाल को, दिया गुरू ने ज्ञान।। ।। जाति धर्म में भेद ये ,जी का है जंजाल। मानव है सब एक सम,छोड़ो सब तत्काल।। करनी ऐसी चाहिए , होय प्रशंसा रोज। खुशबू फैले दूर तक, जैसे खिले सरोज।। चिंता तो जंजाल यह, देना प्रभु पर डार। दूर करेंगे दुख सभी, होगा बेड़ा पार।। कर्म सभी ऐसे करें ,लगे न जी जंजाल। रहे कभी संताप ना , रहे सभी खुशहाल।। दया दिखाओ जीव पर,उसमे भी है जान। लगता क्यों जंजाल ये,क्या मिलती है शान।। मान जगत जंजाल है , लिप्त न हो भरपूर। दो दिन का जंजाल है,जाना है अति दूर।। भटके माया मोह में ,मान जगत जंजाल। ना आये कुछ काम ये , हाल बने बेहाल ।। मानव जीवन जो मिल , करो श्रेष्ठ तुम काम। नहीं फंसो जंजाल में , कर लो जग में नाम।। पूनम शुक्ला...
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रोला छंद विषय विश्वास लग जायें जी जान, धरा पर कर हरियाली। पूरा है विश्वास, मने हर घर दिवाली।। नदिया देती तोय, नहीं सम कोई दानी। मलवा उसमे डाल,करें हम गंदा पानी।। करें मनुज विध्वंस, सभी तरुओं ने जाना। खूब लगाओ पेड़, हवा उनसे है पाना ।। भले नहीं हम एक ,विटप भी आज लगाएं। पर इसके अब लाभ ,सभी को नित बतलाए।। वृक्ष धरा के साथ ,सदा देते खुशहाली। करते हम विश्वास ,धरा पर हो हरियाली।। पूनम शुक्ला
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चौपाई छंद बात गाँव की बड़ी निराली,कूजे तरु पर कोकिल काली। सब्जी भाजी ताजी मिलती, बेला जूही ढेरों खिलती।। गांव हमारा सबसे प्यारा ,प्यारा है यह गांव हमारा। शुद्ध हवा खेड़ा से पायेँ ,होते भोर सैर को जायें।। नदियों का जल कल कल करता । शीतल खुशबू हिय में भरता ।। कच्चे घर की बात पुरानी, ट्यूबवेल में बहता पानी।। ये पगडंडी घर तक जाती । लिपा पुता घर है तब पाती।। देख कृषक का मन है रोता। बिन छप्पर के कैसे सोता।। जीर्ण शीर्ण सी देह तुम्हारी,कृषक देव तुम पालन हारी।। कभी समय जब हम है पाते,गाँव घूमने हम है आते।। हांडी मटठा माखन खाते,गन्ना सरसो नित नित पाते।। मिल सब यहाँ प्यार से रहते,इक दूजे से सुख दुख कहते।। पूनम शुक्ला
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सरसी छंद सुन्दर जीवन दिया ईश ने,पकड़ो उसका हाथ। दुष्कर्मों से नाता तोड़ो, मिलता प्रभु का साथ।। देख दूसरों को तुम सीखो,सुन्दर गहरी बात नहीं मिलेगा वक़्त दिवस में, होती छोटी रात।। कभी किसी से द्वेष न पालो,पावन निर्मल भाव। नश्वर जीवन जान जगत में, पार लगे अब नाव ।। सदाचार हो सबके मन में ,उत्तम श्रेष्ठ विचार। मानव अब मानव से लेकिन,करें नही व्यभिचार।। सुन्दर सपना देखा हमने,बीत गया है साल। चलेअहिंसा पथ पर हम सब,समय कटे खुशहाल।। परम पिता के हम सब बच्चे, जग मेरा परिवार। मिलजुल कर सब रहना सीखें, करके सम व्यवहार।। दोष स्वयं में खोजो तुम नित ,होवे ऊँचा भाल। राई बराबर दोष देख अब,नही बजाओ गाल।। सतपथ के अनुगामी बनकर,किया नेक तुम काम। परहित में अर्पण कर जीवन,करना ना विश्राम।। पर उपकार जगत में केवल ,करता हरदम वीर। रण में भी अब दमका करते,देखो कैसे धीर।। स्वर्ण रश्मियाँ बन के बिखरों,चमके उन्नत भाल । रखो आचरण पावन मन में, भारत के हो लाल।। पूनम शुक्ला
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चौपाई छंद छद्मवेश ना हमको भाया। पहन मुखौटा क्यों दिखलाया।। रुप दिखाएं नर और नारी । धोखा खाती जनता सारी।। कष्ट मयी है जीवन सबका। ज्यादा दुखी बीच का तबका।। पहन मुखौटा शान दिखाते। किससे दुखड़ा आप छिपाते।। कहने से हल निकले भाई । बने हुए हो क्यों हरजाई।। मित्र संग हो समय बिताते। क्यों ना दुखड़ा उन्हें बताते।। अच्छा दिखना हर इक चाहे। दुष्कर करदे सबकी राहें।।।। नकली का तुम ओढ़ लबादा। पूरा कैसे करते वादा।। खुश होने का नाटक करते। पहन मुखौटा पीछे रोते।। सतपथ पर तुम चलते रहना। भले विपत्ति बहुत हो सहना ।। जानवरों के पहन मुखौटे। करके नाटक घर को लौटे।। खेले इससे बच्ची बच्चे । होते देखो मन के सच्चे।। पूनम शुक्ला
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चौपाई छंद नवरातों की पावन बेला, माँ जगदम्बा आयीं हैं। आज सजा लो द्वार फूल से,आशीष ढेर सा लायीं है ।। चाहे कैसे भी तुम पूजो ,कृपा सदा माँ बरसाती है। पहन चुनरिया लाल रंग की,कैसे सबको हरषाती है। मंदिर पर बैठी यह भक्तन ,अब गीत भाव से गायीं है। आज सजा लो द्वार फूल से, आशीष ढ़ेर सा लायी है।। प्रथम मात विराजे शिखर पर, यह शैलपुत्री कहलाती है। कर आराधन मां दुर्गे का,सिंहो सवार को आती है। शुक्ल पाख आश्विन में सुंदर,माँ मूरत नैनन भाई है। आज सजा लो द्वार फूल से आशीष ढ़ेर सा लायीं हैं।। दूजी माता ब्रह्मचारिणी ,यह सब का दुख हर लेती है । निर्मल मन परिपूता देवी, सुख शांति तोष सब देती हैं । सकल विश्व में हो नित पूजा, सज देव लोक से आयीं हैं। आज सजा लो द्वार फूल से, आशीष ढ़ेर सा लायीं हैं।। पूनम शुक्ला
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16 16 मात्राएँ नवरात्रों की पावन बेला, नाच रहा है मन अलबेला । कृपा सदा माँ बरसाती है, कैसे सबको हरषाती है ।। नाम शैलपुत्री मन प्रीता। वेद सार यह पावन गीता।। आज फूल से द्वार सजाया। मैया को अब घर पर पाया।। मैया के सम नाम न दूजा। करते प्रेम भाव नित पूजा ।। माँ सबकी हो पालन हारी । दास तुम्हारी जनता सारी।। पूनम शुक्ला
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छंद चौपाई वृक्ष वृक्ष हमारे जीवन दाता। मानव इससे सब कुछ पाता ।। प्राणवायु भी देने वाला । दुख सबका हर लेने वाला ।। नदियां देती मीठा जल है । पानी से ही निश्चित कल है।। डाल गंदगी मीठे जल को । नष्ट कर रहे अगले पल को।। पेड़ लगाओ धरा बचाओ। मीठे फल तुम नित ही खाओ ।। वृक्ष धरा के भूषण जानो। बात सदा ही मेरी मानो ।। काट बनो को शहर बसाया। जीव जंतु का हुआ सफाया।। पेड़ काटते तुम हो कैसे। बंजर करते बसुधा ऐसे।। पूनम शुक्ला
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घनाक्षरी अकेले पहाड़ पर गिरि शिखर चूमने, चले अकेले घूमने , वहां बसे शिव मेरे, पूजूँ कर जोड़ के।। तृण चुभे पग पर ,कंकण ये पथ पर, पथरीला मार्ग यहां, जाऊं सब छोड़ के।। हिंसक है जीव वहाँ, शिव मेरे साथ यहाँ, भूख लगी जोर अब , खाऊं फल तोड़ के ।। कदम बढ़ाते चल , आगे पग रख कर , पीछे नहीं जाना अब, दृष्टि नहीं मोड़ के।। पूनम शुक्ला
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विषय पुरुष छंद चौपाई नर प्रधान समाज है जानो। नारी का परमेश्वर मानो।। नर नारी का भेद अनोखा । लगता रिश्ता सबको चोखा।। विधि लीला होवे अचरायी। नर को भी है नारी जायी।। सबके प्यारे राम हमारे। मर्यादा के पोषक न्यारे।। मान पिता रख घर है छोड़ा पलक झपकते मुख हैं मोड़ा।। आज पुरुष की बात निराली। प्रतिदिन लेता मद की प्याली।। नर बनता है भाग्य विधाता। अपने गुण वह खुद से गाता।। चौसठ विद्या माधव ज्ञाता । छोड़ अहम तब उनको पाता।। विषय पुरुष पर राय विलग है नर का मन तो सदा अलग है।। जहां दिखे अबला बेचारी नोच नोच कर जाती मारी।। आज व्याप्त है जो बीमारी। उसमे नर का पलड़ा भारी।। नारी को देवी सम माना। वही पुरुष है सच्चा जाना।। जंतु योनि में मानव आएँ। नैनो का यह भ्रम कब जाएँ।। माता से कुछ शिक्षा पाओ। नर सुवास जग में बिखराओं।। कह पूनम मन बहुत कलेशा। रहे भाव ना अब कुछ शेषा।। पूनम
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मनहरण घनाक्षरी लाल परिधान सजे ,मंदिर संगीत बजे। विराजो भवानी माता, जग रूप छाये रे।। शैलपुत्री गिरी वासा, नर नारी सब दासा। चंदन वंदन रोली, श्रद्धा संग लाए रे।। मातृशक्ति रूप तेरा, सज गया द्वार मेरा। दयावान रूप मयी, भक्त सब आये रे।। दुर्गा आराधन कर ,दुख पाप सब हर , जब तप पूजा ध्यान , शांति सुख पाये रे।। पूनम शुक्ला बरेली उत्तर प्रदेश
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मनहरण घनाक्षरी महा गौरी श्वेत वस्त्र धारे अम्बा, मन राखे नही दम्भा। भुजाएं शोभित आठ, लगती निराली है।। त्रिशूल है कर सोहे, रूप तेरा जग मोहे, पाप कर्म नष्ट सारे, जगत उजाली हो ।। शिव वरदान पाया , गौर वर्ण पायी काया, महागौरी महामाया, मैया रुद्र काली हो।। वैभव ऐश्वर्य दाता ,गीत मैया नित गाता, दर्शन दो जगदंबा, श्रेष्ठ बलशाली हो।। पूनम शुक्ला
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मनहरण घनाक्षरी मधुमय शीतलता, शरद चांदनी देती, शरद पूर्णिमा आई, करके श्रंगार रे।। खिली जैसे ज्योति उर, बाल नारी मुनि सुर, स्वागत रजनी करें, सजे घर द्वार रे ।। पूजा-पाठ भक्त करें ,प्रभु रोग सब हरें, पाप मुक्त नर होगें, मिटे अनाचार रे।। दूधिया चांदनी संग, बिखरे विभिन्न रंग, कार्तिकेय जन्मदिन , करें जय कार रे।। पूनम शुक्ला
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रोला छंद काम करेंगे नेक, यही अरदास हमारी। हिंद रहेगा स्वस्थ ,करें तन मन अब वारी ।। लिया जन्म इस पुण्य, धरा को माता जानो। नहीं करो तुम भेद, सभी को अपना मानो।। भारत मां के लाल, कभी भूखे ना सोये । मेरी यह अरदास, कभी सुख चैन न खोये।। मिलकर रहना सभी,बात हैं सुन्दर सारी। परहित में विश्वास,तभी दानवता हारी।। पूनम शुक्ला बहुत सुंदर रचना👌👌👌👌 आपको बहुत बधाई पूनम जी👏👏👏👏👏💐💐
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रोला छंद विषय याद तुम्हारी 1- बिटिया है ससुराल ,नया घर बार बसायें। अम्मा को कर याद , सुता भी चैन न पायेँ।। करूँ तुम्हें मैं याद, नैन है नीर बहाये, खेल खिलौने देख तुम्हारी याद सतायें।। 2- कहां गई तुम मात, कभी कुछ कहके जाती । आती हर पल याद , अश्रु मैं नित बहाती। माता तेरे उपकार, जगत में है बहुतेरे । करती है कल्याण ,बसती हृदय मम मेरे।। पूनम शुक्ला बाकी बहुत खूब बहुत बधाई आपको👏👏👏👏👏👏👏👏
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विषय करवा चौथ चाँद चौथका देख,सजे सुन्दर घर आंगन, देकर पूरा साथ,निभाते हरपल साजन।। बंधन हो मजबूत,साथ ये कभी न छुटे। मन से बांधी डोर,दुआ है कभी न टूटे।। देवों का आशीष ,मिले प्रियतम जग प्यारा। साथ देखकर चाँद,मनाये उत्सव न्यारा।। कर प्रतीक्षा तेरी,चाँद जल्दी तू आना। पति की लंबी उम्र ।वर हमें देते जाना।। लाल पहन परिधान,करवा हाथ में सजता, सजे स्वप्न रंगीन, गीत पिय मन ही बजता ।। पूनम शुक्ला
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कुंडलिया छंद पति पाये लंबी उम्र, रखती वो उपवास , करें चौथ पूजन व्रत ,पूरी होती आस। पूरी होती आस ,चांद की पूजा करते देकर के आशीष, संकट सभी के हरते। कह पूनम सच बात ,कार्तिक प्रात नहाये। गौरी गणेश पूज, लंबी उम्र पति पाये ।। शिक्षा ऑनलाइन की ,पढ़ने को मजबूर। कोरोना कारण हुए,शाला से हम दूर।। शाला से हम दूर, नही घर हमको पढ़ना। होकर ना अब कैद,सुनहरे सपने गढ़ना। सुन पूनम की बात,पढ़कर करो सब साइन। बनी वक्त की मांग,लो शिक्षा ऑनलाइन।। दशरथ नंदन राम की, होवे जय जय कार , ख्याल भक्त का रख सदा, देते विपदा टार।। देते विपदा टार, दूर होवे मन डर का, जनकसुता के संग, ध्यान धरते रघुवर का। सुन पूनम की बात, छुटे सब जग के बंधन। करो राम का जाप, सम्भालें दशरथ नंदन ।।
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मनहरण घनाक्षरी प्रकृति ईश्वर रची,पुण्य कर्म धरा बची, वरद हस्त प्रभु तेरा, सबके पाप हरे।। मौसम शीतल हुआ,मोर पंखी रंग सुआ, मीठी बोली बोलकर, जगत वश करें।। कार्तिक पावन मास,सृष्टि करे खूब हास, लक्ष्मी विष्णु पूजकर, छूँ भूमि पाँव धरे। चारो ओर हरियाली, घास मिले ओस वाली, गुलाबी है ठंड तन, मन उमंग भरे।। पूनम शुक्ला
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कुंडलिया विषय मजबूरी दो जून का पेट भरे, करना है कुछ काज । बच्चे भूखे ना रहे ,काम करें हम आज ।। काम करें हम आज, यही विश्वास दिलाये। घर अन्न और वस्त्र ,सभी अब निश्चित पाये । मजबूरी नर सदा, कभी ना पाये प्रसून। प्रभु कृपा बनी रहे, तब पेट भरे दो जून। 2 मात-पिता ने पाल कर, बेटे किये बलवान । रंग बदलकर सुत सभी, दे न सके सम्मान।। दे न सके सम्मान ,सभी से नाता तोडे । मजबूरी कैसी जान , संग नारी रिश्ता जोडे। कहे पूनम यह क्या, करें अब समय बिताने। किया कौन अपराध ,पालकर मात पिता ने।। पूनम शुक्ला
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श्रृंगार छंद नेह लौ से दमके मन दीप, मान लो ज्यूँ मोती तन सीप । तिमिर घन का होता है नाश, हवा भी दूषित हो कम सांस।। देख कर वसुधा का ये हाल, खिन्न मन से काटे अब साल। धरा रोपे तरु फूकें जान , करें प्रण लेकर मन में ठान।। बड़ों से मिले सदा उपहार , अनुज के लिए रहे मन प्यार। दीप सा दमके सब घर बार, भानु सा खिले निखिल संसार।। पूनम शुक्ला
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श्रंगार छंद हाथ है जिसने मेरा थाम, शीश पर धरे हाथ प्रभु राम। सिया है हर पल जिनके साथ, भक्त के प्यारे है प्रभु नाथ।। मात है तीन जनक है तात, सोच कर किया बडा प्रतिघात। सभी के प्रिय है अब अभिराम, जपा कर उनका प्रतिपल नाम।। अवध है प्यारा उनका धाम , करे हैं वंदन लेकर नाम। भरत को भाई पर अभिमान, चरण को पूज करें हैं मान।। पूनम शुक्ला
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श्रृंगार छंद सुनी है हिय से अब पदचाप, तुम्हीं ने छोड़ी दिल में छाप । बात ये कहनी है चुपचाप , प्यार की गहराई मत नाप।। समझ ना पाए हिय की बात, दिवस ना कटे कटे ना रात। रूठ कर मारा दिल में तीर , बहें है बहुत नैन से नीर।। मीन भी बिन पानी बेकार, भवर को कलियों से है प्यार। बाग में नाचे जैसे मोर। प्रीत की मन में रहती डोर ।। पूनम शुक्ला
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मनहरण घनाक्षरी शीत की सुहानी भोर, अलसाये दिनकर, अभी थोड़ा और सोऊँ, ठान लिया मन में ।। कोहरे का साम्राज्य ,फैल रहा चहुँ ओर। उषाकाल सुरमई, छिपी हुई घन में।। दिखे नहीं कुछ और, खग पक्षी करे शोर। चहकना चिड़ियों का, बसे सब जन में ।। पूनम नमन करें, मन में उमंग भरे, देव कैसे वास करें, दम्भी इस तन में।। आदित्य के रश्मि रथ,भागीरथी तट पर , स्वर्ण जटित रेत, चमके वतन में।। कलियों ने पट खोला ,भंवरा भी अब डोला , जगत पालनहार , माहिर है फन में।। गुलाब चमेली अब ,जूही बेला गेंदा सब , महकाये जगत को, कस्तूरी ज्यों वन में।। पूनम प्रार्थना करे,शीश प्रभु पग धरे। प्रभु का नाम जपो, मुक्ति मिल छन में।। पूनम शुक्ला
श्रृंगार हास्य छंद
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एक थे सेठ बड़े चालाक, बड़े से नेत्र तनिक सी नाक। किलो के कान पेट तंदूर, खौफ ना कोई मद में चूर।। अन्न को खाकर खुलती आँख, चमकती फूलों की हो पाँख। यही बस करता सोच विचार, कहाँ से रुपये मिले हजार ।। नगर में घूमा करते चोर , सदन में नेता करते शोर । धनी बन घूमे मूँछे ऐठ, बोलकर कहते सब है सेठ।। सेठ का बिगड़ गया है लाल, देखकर हाल हुआ बेहाल। सेठ ने मारे हैं दो हाथ , लाल ने छोड़ दिया अब साथ ।। भीख भी मिलना ना आसान, करो ना रोटी का अपमान छोड़कर गलत काम को आज, किया अब अपने दिल पर राज।। पूनम शुक्ला
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दोहे समय नही आराम का, करना हमको काम। करते है आराम जो, कैसे होवे नाम।। जीवन हो आराम का, कर लो ऐसा काम। कभी पछताना न पड़े, जपो राम का नाम।। मेहनत से डरें सदा, करते है आराम। छूते नही अम्बर को, होते वे नाकाम।। जगत भावना शुद्ध हो,नीकी राखो चाल। कर देव विश्वास अगर,बदले तेरे हाल।। सोच समझ कर बोलना,होता ना आसान। रखना ऐसी भावना,होवे सबका मान।। पूनम शुक्ला पूनम शुक्ला
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श्रांगार छंद प्यार के मीठे बोलो बोल, प्यार के बोल बड़े अनमोल। कभी ना बोलो कड़वे बोल, समझ कर मुख तुम अपना खोल।। जगत में उनकी हो पहचान, उन्हीं से होती घर की शान। सदा जो करते सबसे प्यार, सभी के लिए सदा तैयार।। छोड़कर अपशब्दों को आज, करो तुम सुंदर सुंदर काज। जगत में पाओगे सम्मान, किसी का करना ना अपमान।। पूनम शुक्ला
नारी
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घनाक्षरी नारी की इज्जत आज ,ध्वस्त हुई सरे राह , महिला सशक्त बने, जग में सम्मान हो ।। दहेज लालची जन, मांगे सोना चांदी धन , दुष्ट पापी को तो अब, जेल प्रावधान हो ।। कन्या परिधान पर, करते जो छींटाकशी, दरिंदगी कृत्य पर , सजा न आसान हो ।। शैतानों के हवस की,अबला शिकार बनी, ऐसे शिकारी को तो, मौत का विधान हो।। पूनम शुक्ला
लावणी शहीद
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लावणी छंद विषय मिट्टी भारत की मिट्टी है पावन ,हम सब शीश झुकाते हैं। बलिदानी वीरों की गाथा ,सबको खूब सुनाते हैं।। जन्म लिया इस मिट्टी मेंअब, माथे तिलक लगाते हैं । अमर शहीदों की कुर्बानी ,भूल नहीं हम पाते हैं । शस्य श्यामला मिट्टी में ये, अन्न खूब उपजाता है। निशदिन सेवा कर किसान ये, माटी स्वर्ण बनाता है ।। अन्न फूल फल देकर हमको जीवन यही बचाता है। इसको करके नमन हमेशा ,वीर पुत्र कहलाता है।। माटी की कीमत तो केवल, वही वीर बतलायेगा। देश की खातिर सीमा से जो, पहन तिरंगा आयेंगा।। शेखर और सुभाष भगत ने,भारत मान बढाया था। जन्म मिले शत बार यहीं पर,प्रभु से खूब मनाया था।। पूनम शुक्ला
आशा लावणी
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लावणी छंद छाँट निराशा काले बादल, उजियारा मन में भरना। आशा का अब दीप जलाकर, कष्ट सभी के तुम हरना।। अगर सफलता पानी तुमको,बढ़ते आगे ही जाना, भीषण झंझावातों में भी,नही तनिक तुम घबराना। पुष्प सेज ना यह जीवन है,समझ बूझ कर पग धरना। आशा का अब दीप जलाकर,कष्ट सभी के तुम हरना।। सुख दुख जीवन के साथी है, विचलित इनसे मत होना, मन में रख विश्वास ईश पर ,धैर्य कभी तुम मत खोना । बिखरे शूल समेट पथिक के , बनना तुम निर्मल झरना। आशा का अब दीप जलाकर, कष्ट सभी के तुम हरना।। उम्मीदों की कली खिले औ , जीवन सबका महकायें। लक्ष्य साधना जिनकी मंजिल, गिरि शिखरों पर चढ़ जायें । छोड़ दुखों के कच्चे धागे ,रुदन कभी तुम मत करना । आशा का तुम दीप जलाकर ,कष्ट सभी के तुम हरना ।। पूनम शुक्ला बहुत बेहतरीन रचना आपकी आदरणीया बधाई आपको👏👏👌👌🙏
लावणी छंद मानव
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लावणी छंद कितने जन्मों के पुण्यों से, मानव ने नर तन पाया। कर्मों के अनुसार जगत में, सुख-दुख की पड़ती छाया।। परम पिता के प्यारे बच्चे,माँ के बहुत दुलारे हैं। लेकिन फिर भी आपस में वे ,द्वेष भाव मन धारे है।। मानवता की रक्षा खातिर, ,हमको प्रण करना होगा। देख विपत्ति जगत में सब की ,कष्ट सभी हरना होगा।। विश्व बने परिवार हमारा, मन भीतर ना घाव रहे। भाईचारा प्रबल रहे अब, अपनापन का भाव रहे।। तोड़ दीवार जाति धर्म की, नेक राह पर आयेगा। करें प्रेम जन-जन से जब वह ,तब मानव कहलायेगा। दया धर्म हो मन में अपने ,सब धर्मों की सीख यही , कलुष विचार त्याग दो सारे, मानवता की रीत यही।। पूनम शुक्ला अति सुंदर सृजन के लिये बधाई आपको पूनम जी भाव व गेयता की दृष्टि से भी उत्तम रचना👏👏👌👌🙏🙏
दोहे देश धर्म
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करो समर्पित देह को ,नहीं करो अभिमान। आयें देश के काम जो , श्रेष्ठ वहीं इंसान। अपना ही सोचो नहीं, जग का करो विचार । जो जगत का सोच लिया , नहीं रहे व्यभिचार।। जिसने मानव तन दिया, मानो तुम उपकार। धर्म की बलिवेदी पर, कर दो जीवन वार।। मेरा मेरा क्यों करे,सब कुछ लिया उधार। गिन गिन कर देना पड़े, यही जगत व्यवहार।। करो समर्पित देव को ,समझ उन्हीं की चाल। करें नेक कुछ काज हम,चाहे हो जिस हाल।। पूनम शुक्ला
दोहें हिम्मत
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हिम्मत मन में रख सदा ,करो श्रेष्ठ तुम काम । रखो भरोसा ईश पर , समझ सफल तब नाम।। देखो पक्षी को जरा ,उड़ते पंख पसार । हिम्मत से वे तो सदा, माने कभी ना हार।। आगे बढ़कर ठान लो, मुश्किल हो यदि काज । हिम्मत को छोड़ो नहीं, मिल जाएगा ताज।। हिम्मत से बनते सदा ,सारे बिगड़े काम । चिंता सारी छोडिये ,भला करेंगे राम।। करो नमन उनको सदा ,लिखते जो इतिहास। हिम्मत के बल पर वही , बन जाते हैं खास।। पूनम शुक्ला
परिवार दोहे
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सुख दुख में जो साथ दे,कहते हम परिवार । *एक हमारी छत रहे* ,रहे नेह आधार।। *गिरि शिखर पर चढ़ना हो ,चाहे कठिन उड़ान*। संग रहे परिवार का ,होगा सब आसान।। *रात भर दीपक जले* ,दूर करें अंधियार। घोर निराशा में करें ,यही काम परिवार ।। सिमट गए परिवार सब, भूले देना मान। नौका सबकी डूब रही, शत प्रतिशत लो जान।। पूनम शुक्ला
दोहे किसान
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, दोहे धरती कहे किसान से ,तुम पर जग का भार संग तुम्हारे देश के ,बाल वृद्ध नर नार।। बोओ सीना चीर के, धरती कहती आज । फल फूल अरु अन्न संग,मिलते चावल प्याज। देने वाली है धरा , देती जीवन दान। सुरभित जिससे जग हुआ, रत्नों की वह खान।। धरती माता कह रही ,समझो मत बेजान। गहना मेरे प्रिय तरू ,मत काटो नादान।। पूनम शुक्ला
विश्वास
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दोहे *रिश्ते सब मजबूत हो*,*हमको है विश्वास* । आपस में विश्वास से ,बनता रिश्ता खास ।। *मन में हो विश्वास यदि* ,पूरे होते काम । प्रभु मर्जी के बिन कभी ,होता ना आराम।। *रिश्ता मन से प्रेम का*, रखना सब संभाल । प्रीत करो जग में सदा, ना बदलो तुम चाल।। बिन विश्वास जग में कब , पूरी होती प्रीत। टूट गया मन से अगर, रुठ जाएगा मीत।। एक बार जो तोड़ दे, किया गया विश्वास । जीवन में करना नहीं ,फिर उससे कुछ आस।। मुश्किल कितनी भी पड़े, पकड़ो प्रभु का हाथ। मन में हो विश्वास यदि ,प्रभु देगा नित साथ।। पूनम शुक्ला
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6/12/21 से 11/12/21 मुक्तक 1 कभी दो पल यहां बैठो बुने सपने सुनाने दो। खुशी में आज हमको भी यहीं गुलशन सजाने दो। करेंगे आज से कोशिश कभी कोई खता ना हो गुलाबी ठंड में हमको सृजन के गीत गाने दो।। 2 तपस्या का मिला परिणाम मंदिर अब सजाने दो। धरा के राम भक्तों को कभी अपनी सुनाने दो। सहे हैं कष्ट धरती पर मगर चुपचाप रहते हैं। दिवस है आज उनका भी सृजन के गीत गाने दो। 3 नहीं शिकवा हमें है आज इस गुजरे जमाने से मिला है क्या बता दो राज हमको यूँ सताने से बहुत दिन बाद मिलकर भी नजर क्यूँ फ़ेर ली तुमने अगर नगमे नहीं गाने बुलाया क्यों बहाने से 4 घटा संगीत छायी है तरन्नुम के बजाने से मधुर वीणा बजी है आज साजो के तराने से फलक से तोड़ तारों को सजाया प्रेम पथ तुमने न आना था अगर तुमको बुलाया क्यों बहाने से 5 झुका कर आज नजरों को पलक को क्यों भिगाते हो बुलाना था नहीं दर पर पता फिर क्यों बताते हो डरे हो क्यों जमाने से अगर देना नहीं धोखा बनाकर इस तरह दूरी हमें तुम क्यों सताते हो 6 किया था प्रेम बंशी से अधर पर जो सजाते ह...