मनहरण घनाक्षरी
शीत की सुहानी भोर, अलसाये दिनकर,
अभी थोड़ा और सोऊँ,
ठान लिया मन में ।।
कोहरे का साम्राज्य ,फैल रहा चहुँ ओर।
उषाकाल सुरमई,
छिपी हुई घन में।।
दिखे नहीं कुछ और, खग पक्षी करे शोर।
चहकना चिड़ियों का,
बसे सब जन में ।।
पूनम नमन करें, मन में उमंग भरे,
देव कैसे वास करें,
दम्भी इस तन में।।
आदित्य के रश्मि रथ,भागीरथी तट पर ,
स्वर्ण जटित रेत,
चमके वतन में।।
कलियों ने पट खोला ,भंवरा भी अब डोला ,
जगत पालनहार ,
माहिर है फन में।।
गुलाब चमेली अब ,जूही बेला गेंदा सब ,
महकाये जगत को,
कस्तूरी ज्यों वन में।।
पूनम प्रार्थना करे,शीश प्रभु पग धरे।
प्रभु का नाम जपो,
मुक्ति मिल छन में।।
पूनम शुक्ला
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