*लेख अधर्म पर धर्म की जीत का पर्व*- *विजयादशमी* भारत के त्योहार देश की संस्कृति और सभ्यता के दर्पण है राष्ट्रीय उल्लास उमंग और उत्साह के प्राण हैं विभिन्नता की इंद्रधनुषी एकता और अखंडता के प्रतीक हैं। त्योहारों के देश भारत में हर दिन मेला है ।हर पर्व पर पूजा-पाठ है। दशहरा अश्विन माह की शुक्ल पक्ष की दशमी को मनाया जाता है. यह नवरात्र खत्म होते ही अगले दिन आने वाला त्योंहार है। विजयदशमी बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व है. ये त्योहार देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग कारणों से मनाया जाता है । कुछ राज्यों में इसे दशहरा के रूप में मनाया जाता है. वो इस त्योहार को रावण पर भगवान राम की जीत के रूप में मनाते हैं. रावण के पुतले, जो बुराई का प्रतीक हैं, आतिशबाजी के साथ जलाए जाते हैं. दशहरे के दिन देवी अपराजिता की पूजा भी की जाती है.शमी पूजा भी विजयादशमी पर किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है. इसे अपराह्न के समय करना चाहिए. दशहरा के दिन शस्त्रों की भी पूजा की जाती है. यह त्योहार भारतीय संस्कृति के वीरता का पूजक, शौर्य का उपासक है। आश्विन शुक्ल दशमी को म...
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Showing posts from October, 2021
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लेख महत्त्वपूर्ण आराधना दिवस - दुर्गा अष्टमी या देवी सर्वभूतेषु मां गौरी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। भगवती दुर्गा, मां काली, मातंगी, कमला भुवनेश्वरी सभी एक ही हैं। उनके रूप-स्वरूप में भिन्नता नहीं है। तथा अपनी इच्छा सामने रखकर, बाल हृदय से आर्त पुकार करते हुए साधना करनी चाहिए चैत्र नवरात्रि में अष्टमी का सर्वाधिक महत्व है। साधारणतया यह कुलदेवी का दिन माना जाता है। पुराने वृद्ध, वरिष्ठ सभी जानते तथा कुलदेवी का पूजन-अर्चन इस दिन करते हैं। काली, महाकाली, भद्रकाली, दक्षिण काली तथा बिजासन माता का पूजन इस दिन करते हैं। जो लोग घटस्थापना करते हैं तथा देवी पाठ, जप कराते-करते हैं, अधिकतर इस दिन हवन करते हैं। वैसे इस दिन की अधिष्ठात्री देवी महागौरी हैं। वैभव, ऐश्वर्य प्रदान करने में इनकी समता कोई नहीं कर सकता है। आठवें दिन महागौरी की पूजा अर्चना की जाती है. माना जाता है कि महागौरी आदी शक्ति हैं इनके तेज से संपूर्ण सृष्टि प्रकाश-मान है इनकी शक्ति अमोघ फलदायिनी है. महागौरी की चार भुजाएं हैं उनकी दायीं भुजा अभय मुद्रा में हैं और नीचे वाली भुजा में त्रिशूल शोभता ह...
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चौपाई छंद हमारे गांव बात गाँव की बड़ी निराली,कूजे तरु पर कोकिल काली। सब्जी भाजी ताजी मिलती, बेला जूही ढेरों खिलती।। गांव हमारा सबसे प्यारा ,प्यारा है यह गांव हमारा। शुद्ध हवा खेड़ा से पायेँ ,होते भोर सैर को जायें।। नदियों का जल कल कल करता । शीतल खुशबू हिय में भरता ।। कच्चे घर की बात पुरानी, ट्यूबवेल में बहता पानी।। ये पगडंडी घर तक जाती । लिपा पुता घर है तब पाती।। देख कृषक का मन है रोता। बिन छप्पर के कैसे सोता।। जीर्ण शीर्ण सी देह तुम्हारी,कृषक देव तुम पालन हारी।। कभी समय जब हम है पाते,गाँव घूमने हम है आते।। हांडी मटठा माखन खाते,गन्ना सरसो नित नित पाते।। मिल सब यहाँ प्यार से रहते,इक दूजे से सुख दुख कहते।। पूनम शुक्ला
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चौपाई छंद मुखौटा छद्मवेश ना हमको भाया। पहन मुखौटा क्यों दिखलाया।। रुप दिखाएं नर और नारी । धोखा खाती जनता सारी।। कष्ट मयी है जीवन सबका। ज्यादा दुखी बीच का तबका।। पहन मुखौटा शान दिखाते। किससे दुखड़ा आप छिपाते।। कहने से हल निकले भाई । बने हुए हो क्यों हरजाई।। मित्र संग हो समय बिताते। क्यों ना दुखड़ा उन्हें बताते।। अच्छा दिखना हर इक चाहे। दुष्कर करदे सबकी राहें।।।। नकली का तुम ओढ़ लबादा। पूरा कैसे करते वादा।। खुश होने का नाटक करते। पहन मुखौटा पीछे रोते।। सतपथ पर तुम चलते रहना। भले विपत्ति बहुत हो सहना ।। जानवरों के पहन मुखौटे। करके नाटक घर को लौटे।। खेले इससे बच्ची बच्चे । होते देखो मन के सच्चे।। पूनम शुक्ला
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माँ जगदम्बा नवरातों की पावन बेला, माँ जगदम्बा आयीं हैं। आज सजा लो द्वार फूल से,आशीष ढेर सा लायीं है ।। चाहे कैसे भी तुम पूजो ,कृपा सदा माँ बरसाती है। पहन चुनरिया लाल रंग की,कैसे सबको हरषाती है। मंदिर पर बैठी यह भक्तन ,अब गीत भाव से गायीं है। आज सजा लो द्वार फूल से, आशीष ढ़ेर सा लायी है।। प्रथम मात विराजे शिखर पर, यह शैलपुत्री कहलाती है। कर आराधन मां दुर्गे का,सिंहो सवार को आती है। शुक्ल पाख आश्विन में सुंदर,माँ मूरत नैनन भाई है। आज सजा लो द्वार फूल से आशीष ढ़ेर सा लायीं हैं।। दूजी माता ब्रह्मचारिणी ,यह सब का दुख हर लेती है । निर्मल मन परिपूता देवी, सुख शांति तोष सब देती हैं । सकल विश्व में हो नित पूजा, सज देव लोक से आयीं हैं। आज सजा लो द्वार फूल से, आशीष ढ़ेर सा लायीं हैं।। पूनम शुक्ला
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छंद चौपाई वृक्ष वृक्ष हमारे जीवन दाता। मानव इससे सब कुछ पाता ।। प्राणवायु भी देने वाला । दुख सबका हर लेने वाला ।। नदियां देती मीठा जल है । पानी से ही निश्चित कल है।। डाल गंदगी मीठे जल को । नष्ट कर रहे अगले पल को।। पेड़ लगाओ धरा बचाओ। मीठे फल तुम नित ही खाओ ।। वृक्ष धरा के भूषण जानो। बात सदा ही मेरी मानो ।। काट बनो को शहर बसाया। जीव जंतु का हुआ सफाया।। पेड़ काटते तुम हो कैसे। बंजर करते बसुधा ऐसे।। पूनम शुक्ला
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घनाक्षरी अकेले पहाड़ पर गिरि शिखर चूमने, चले अकेले घूमने , वहां बसे शिव मेरे, पूजूँ कर जोड़ के।। तृण चुभे पग पर ,कंकण ये पथ पर, पथरीला मार्ग यहां, जाऊं सब छोड़ के।। हिंसक है जीव वहाँ, शिव मेरे साथ यहाँ, भूख लगी जोर अब , खाऊं फल तोड़ के ।। कदम बढ़ाते चल , आगे पग रख कर , पीछे नहीं जाना अब, दृष्टि नहीं मोड़ के।। पूनम शुक्ला
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विषय पुरुष छंद चौपाई नर प्रधान समाज है जानो। नारी का परमेश्वर मानो।। नर नारी का भेद अनोखा । लगता रिश्ता सबको चोखा।। विधि लीला होवे अचरायी। नर को भी है नारी जायी।। सबके प्यारे राम हमारे। मर्यादा के पोषक न्यारे।। मान पिता रख घर है छोड़ा पलक झपकते मुख हैं मोड़ा।। आज पुरुष की बात निराली। प्रतिदिन लेता मद की प्याली।। नर बनता है भाग्य विधाता। अपने गुण वह खुद से गाता।। चौसठ विद्या माधव ज्ञाता । छोड़ अहम तब उनको पाता।। विषय पुरुष पर राय विलग है नर का मन तो सदा अलग है।। जहां दिखे अबला बेचारी नोच नोच कर जाती मारी।। आज व्याप्त है जो बीमारी। उसमे नर का पलड़ा भारी।। नारी को देवी सम माना। वही पुरुष है सच्चा जाना।। जंतु योनि में मानव आएँ। नैनो का यह भ्रम कब जाएँ।। माता से कुछ शिक्षा पाओ। नर सुवास जग में बिखराओं।। कह पूनम मन बहुत कलेशा। रहे भाव ना अब कुछ शेषा।। पूनम
लाल परिधान घनाक्षरी
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दिनांक - 11.10.2021 बिषय - माता आराधना विधा मनहरण घनाक्षरी लाल परिधान सजे ,मंदिर संगीत बजे। विराजो भवानी माता, जग रूप छाये रे।। शैलपुत्री गिरी वासा, नर नारी सब दासा। चंदन वंदन रोली, श्रद्धा संग लाए रे।। मातृशक्ति रूप तेरा, सज गया द्वार मेरा। दयावान रूप मयी, भक्त सब आये रे।। दुर्गा आराधन कर ,दुख पाप सब हर , जब तप पूजा ध्यान , शांति सुख पाये रे।। पूनम शुक्ला बरेली उत्तर प्रदेश रचना स्वरचित ©
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महा गौरी मनहरण घनाक्षरी श्वेत वस्त्र धारे अम्बा, मन राखे नही दम्भा। भुजाएं शोभित आठ, लगती निराली है।। त्रिशूल है कर सोहे, रूप तेरा जग मोहे, पाप कर्म नष्ट सारे, जगत उजाली हो ।। शिव वरदान पाया , गौर वर्ण पायी काया, महागौरी महामाया, मैया रुद्र काली हो।। वैभव ऐश्वर्य दाता ,गीत मैया नित गाता, दर्शन दो जगदंबा, श्रेष्ठ बलशाली हो।। पूनम शुक्ला
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नमन मंच सरसी छंद साइकिल की वे मधुर यादें, भूलूँ न किसी हाल। बड़े ठाठ का वाहन मेरा, बदली मेरी चाल।। सन अस्सी का दिवस मनोरम, आया सुंदर याद। बैठ साइकिल पढ़ने जाते, घंटी लगती नाद।। लाख टके की गाड़ी परअब, आती ना वह बात । हमने पैसा जोड़ खरीदी, प्यारी सी सौगात।। स्वस्थ अगर रहना है हमको, करना है अभ्यास। जिम में जाकर बहे पसीना, आता हमको रास।। मजबूत बनानी देह अगर, करो नेक तुम काम। तीस मिनट तुम बैठ साइकिल, घूमो प्रतिदिन शाम।। देख साइकिल झूमा करते, करते हम अभिमान। फूल शान से कुप्पा होते, कम समझो ना शान।। जाना हो कॉलेज समय से ,जाना हो बाजार । सही समय पर हमें पहुँचाती, गति जैसे हो कार।। दो पहियों की होती सुन्दर, बैठे एक सवार। आगे निकले भीड़ भाड़ में, होती कभी न हार।। शाही सवार हूँ मैं इसका, चलता मेरा काज। ना चाहिए पेट्रोल-डीजल, करते इस पर राज ।। वायु प्रदूषण रोका करती, ले मारुत का भार । धन की यह बर्बादी रोके ,नहीं चाहिए कार।। पूनम शुक्ला
बापू को समर्पित सत्य अहिंसा पथ
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बापू को समर्पित सत्य अहिंसा पथ पुजारी, मोहनदास महान । पावन उनकी जन्मतिथि है ,करते सब सम्मान ।। अंग्रेजों से लोहा लेकर ,करते बहुत कमाल । जीर्ण शीर्ण सी देह तुम्हारी ,मन में नहीं सवाल।। झूठ बोलना चोरी करना, देता था संताप । बुरी आदतें दुष्कर्मो को, माना उसने पाप ।। करना था आजाद देश को, लिया शौक ये पाल। हुआ देश आजाद मगर था, आया उसका काल ।। देश प्रेम था बहे रगों में, अद्भुत वीर जवान। दांडी यात्रा शुरू की थी, बन कर धीर महान।। मानवता के अधिकारों की ,कहते सुंदर बात। चुप सीने पर गोली खाते ,सहते सब आघात।। सच की ताकत के आगे , ब्रिटिश गये सब हार । गोरों की सत्ता ने भीअब, बंद किया व्यापार ।। राष्ट्रपिता और बापू कैसा, रखे सुंदर नाम। सच की लाठी को पकड़कर, किया श्रेष्ठ तुम काम ।। चरखे को पहचान दिलाई ,लिखा देश इतिहास । अब दीन दुखी और दलित जनों ने , ली चैन की सांस।। गोरों से अब लड़ी लड़ाई, तन मन सब कुछ डार। ना गोले बंदूक चलाये ,किया नहीं प्रहार।। जय बोलो जय बोलो बापू ,तेरी जय जयकार । तुमसे अच्छा देश हित में, म...
लाल बहादुर मनहरण घनाक्षरी
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लाल बहादुर मनहरण घनाक्षरी नमन मंच भारत की शान लाल, पैंसठ का शुभ साल , विचार जीवन सादा कभी ना भुलायेंगे।। *समृद्ध किसान नारा*,*सैनिक भी लगे प्यारा* , सादगी जीवन भर, गुणगान गाएंगे।। भारत के रत्न आप, कद काठी मत नाप , देश पर सब वारा, मस्तक झुकाएंगे।। इरादे बुलंद भले, अभावों में बढ़े पले, याद कर आज सभी, उत्सव मनायेंगे।। पूनम शुक्ला
छंद दोहे नीयत हो उत्तम
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छंद दोहे नीयत हो उत्तम सदा , बनों नेक इंसान। नहीं फसे जंजाल में, बनती है पहचान।। जन्म मृत्यु से तार दो, विनय करुँ भगवान। जी का है जंजाल ये, होता नहीं निदान ।। मन में अब संतोष रख, देना ना कुछ ध्यान। छोड़ जगत जंजाल को, दिया गुरू ने ज्ञान।। ।। जाति धर्म में भेद ये ,जी का है जंजाल। मानव है सब एक सम,छोड़ो सब तत्काल।। करनी ऐसी चाहिए , होय प्रशंसा रोज। खुशबू फैले दूर तक, जैसे खिले सरोज।। चिंता तो जंजाल यह, देना प्रभु पर डार। दूर करेंगे दुख सभी, होगा बेड़ा पार।। कर्म सभी ऐसे करें ,लगे न जी जंजाल। रहे कभी संताप ना , रहे सभी खुशहाल।। दया दिखाओ जीव पर,उसमे भी है जान। लगता क्यों जंजाल ये,क्या मिलती है शान।। मान जगत जंजाल है , लिप्त न हो भरपूर। दो दिन का जंजाल है,जाना है अति दूर।। भटके माया मोह में ,मान जगत जंजाल। ना आये कुछ काम ये , हाल बने बेहाल ।। मानव जीवन जो मिल , करो श्रेष्ठ तुम काम। नहीं फंसो जंजाल में , कर लो जग में नाम।। पूनम शुक्ला