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Showing posts from September, 2021
रोला छंद     विषय विश्वास लग जायें जी जान, धरा पर कर हरियाली।  पूरा है विश्वास, मने हर घर दीवाली।।  नदिया देती तोय, नहीं सम  कोई दानी। मलवा उसमे डाल,करें हम गंदा पानी।।  करें  मनुज विध्वंस, सभी तरुओं  ने जाना।  खूब लगाओ पेड़,  हवा उनसे है पाना ।। भले नहीं हम एक ,विटप  भी आज लगाएं।  पर इसके अब लाभ ,सभी को नित बतलाए।।  वृक्ष धरा के साथ ,सदा देते खुशहाली।  करते हम विश्वास ,धरा पर हो हरियाली।। पूनम शुक्ला
 सरसी छंद सुन्दर जीवन दिया ईश ने,पकड़ो उसका हाथ। दुष्कर्मों से नाता तोड़ो, मिलता प्रभु का साथ।। देख दूसरों को तुम सीखो,सुन्दर गहरी बात  नहीं मिलेगा वक़्त दिवस में, होती छोटी रात।। कभी किसी से द्वेष न पालो,पावन निर्मल भाव। नश्वर जीवन जान जगत में,  पार लगे अब नाव ।। सदाचार हो सबके मन में ,उत्तम श्रेष्ठ  विचार। मानव अब मानव से लेकिन,करें नही व्यभिचार।। सुन्दर सपना देखा हमने,बीत गया है साल। चलेअहिंसा पथ पर हम सब,समय कटे खुशहाल।। परम पिता के हम सब बच्चे, जग मेरा परिवार। मिलजुल कर सब रहना सीखें, करके सम व्यवहार।। दोष स्वयं  में खोजो तुम नित ,होवे ऊँचा भाल। राई बराबर दोष देख अब,नही बजाओ गाल।। सतपथ के अनुगामी बनकर,किया नेक तुम काम। परहित में अर्पण कर जीवन,करना ना विश्राम।। पर उपकार जगत में केवल ,करता हरदम वीर। रण में भी अब दमका करते,देखो कैसे धीर।। स्वर्ण रश्मियाँ बन के बिखरों,चमके उन्नत भाल । रखो आचरण पावन मन  में, भारत के हो लाल।। पूनम शुक्ला
 मनहरण घनाक्षरी शुभ भोर देखकर, जगे सब नारी नर,  प्रभाती सुहानी दिखी, स्वर्ण रश्मि छान के।।  सुगंध पवन बहे, धरा पर ओस रहे , हरियाली वसुंधरा,  क्षितिज है मान के ।। चंदन वंदन करें , गीत प्रभु गुन धरें,  नवल प्रभात देख, पौधे रोपे धान के ।। दिवस कीमती सब, उपभोग हम करें,  दीन दुखी सेवा नित,  करें खूब जान के।। पूनम शुक्ला
 *शब्द वंचित* प्रिय से वंचित देख ,नैन सबके भर आए।  कोरोना ने हाय, दिवस यह क्यों दिखायें। मात-पिता का छीन सहारा दुविधा में डाला।  बच्चों को  भी मात-पिता से वंचित  कर डाला।। अपनों का यह  दुख  भला कोई कैसे जाने। रिश्ते नाते मित्र पड़ोसी दुख मे ही पहचाने।। पूनम शुक्ला बरेली

रोला छंद बेटियाँ बेटी है अनमोल,

रोला छंद  बेटियाँ  बेटी है अनमोल, जगत ने इसको माना।  आज समय है खास, खुशी तुम खूब मनाना।।  भाई बनता खास, बहन का मिले सहारा । देती सबका साथ, रहा जो हिम्मत हारा।  सब रिश्तो को आज, पड़ा हैं खूब निभाना।  बेटी है अनमोल ,जगत ने इसको माना।।  कहते अच्छा भाग्य ,अगर सुत जननी जाये ।  होता है सौ भाग्य, बड़ा दुहिता जो पाये।  प्रीत करो अब खूब, चले ना कोई बहाना।  बेटी है अनमोल ,जगत ने इसको माना।।  कैसे माने बात , सुता है नहीं परायी।  देती संबल आज, उसे भी जननी जायी। रखती सब की लाज, नहीं है उसे सताना । बेटी है अनमोल, जगत ने इसको माना।। करती रोशन नाम, जगत में कर उजियारा । होता गौरव गान, गगन ज्यों चमके तारा।  उसको देकर मान, सभी अधिकार दिलाना । बेटी है अनमोल ,जगत ने इसको माना।।   पूनम शुक्ला

रोला छंद विषय धर्म धारयते इति

रोला छंद विषय धर्म धारयते इति धर्म  ,यही परिभाषा जानो। सही नही अब भेद, सभी जीवों में मानो।। रखो आचरण श्रेष्ठ, अगर नर तन है पाया। कहना सच ही बात,जगत की सुंदर माया।। चोरी करना पाप,कहे यह धरम हमारा। सनातनी विश्वास, प्रभू का खूब सहारा।। भोजन शाकाहार,जीव पर दया विचारों । पशुओं में भी जान,किसी को ना अब मारो।। पाया सुन्दर जन्म,कहाँ से हम हैं आये। जाना है किस ओर,धरम हमको बतलाये।। प्रभु की सब संतान, दृष्टि हो धवल तुम्हारी। मिले धरम से ज्ञान,करों तुम बातें प्यारी।। ऊंच नीच का भेद,नहीं हमने है जाना। भाईचारा प्रीत,सदा मधुमय बरसाना।। रखें नेक  व्यवहार ,नहीं कलुषित मन धारें। पकड़ धरम की राह, कभी हिम्मत ना  हारे।। पूनम शुक्ला

तांटक छंद चंद्र शेखर आजाद

 तांटक छंद चंद्र शेखर आजाद आजाद नाम था प्रिय उसको,माँ देवी जगरानी थी, देश नाम पर मर मिटने की,उसने मन मे ठानी थी।। भीलों का गॉव भावरा पितु, सीताराम तिवारी थे, मातृभूमि की रक्षा खातिर,अपना सब कुछ वारी थे।। बचपन में ही जान गया था ,गोरों के मन काले हैं।  धर्म जाति पर भेद किया औ,दुष्टों की यह  चाले है  ।। बापू थे आदर्श भले पर ,मन से ना जुड़ पाया था।  आजादी का अमर तराना ,दिल से सुंदर गाया था ।। बचपन में जो कोड़े तन पर, गोरों से वह खाए थे । जीवन भर आजाद रहे फिर, चंगुल में ना आए थे।।  जीवित मुझ को पकड़े यह तो, नहीं भाग्य का लेखा है।  संकल्प शक्ति के दम पर हमने, भाग्य बदलते देखा है।। अलफ़्रेंड पार्क का देश भक्त , योद्धा  हिंदुस्तानी था। मार  कनपटी गोली खुद को, भारत का सेनानी था।। पूनम शुक्ला

रोला छंद मिल जुल कर सब बैठ

रोला छंद  मिल जुल कर सब बैठ,प्यार से खाना खाते। सुख दुख अपना रोज,किसी से कह सुन पाते।। गुल्लक  को अब फोड़, सभी की खुशियाँ लाते। मिलती हमको सीख,बाँट कर खुशी मनाते।। बचपन का जो बीत, समय फिर इसको लाते । करनी है अब प्रीत, सदा मिल कर हम गाते ।। ढूढ़े हम हर रोज,कहाँ है गुल्लक मेरी ।  खुशियाँ दी है बाँट, सजे अधरों   पर तेरी।। कटुता में है नही ,लाभ सबको बतलाते। गुल्लक से कर प्रीत, तभी सब खुशियाँ पाते।। पूनम शुक्ला

मनहरण घनाक्षरी राधा कृष्ण संवाद

 मनहरण घनाक्षरी *राधा* दिन रात एक कर, कान्हा तेरा नाम जपे।  निर्मोही माधव मेरा,  कहां गया श्याम रे।।  आएंगे वापस कह, मथुरा निकल गए,  कैसे रहूं तेरे बिन,  लेते नहीं नाम रे।। *कृष्ण*  पूरा नहीं तुम बिन, दिन कांटू गिन गिन,  साथ मेरे रहो प्रिये , पूरा करूं काम रे।।  लागे नहीं मन मेरा, राधा मेरी श्याम तेरा , असुरों का  नाश कर, आऊं  तेरे धाम रे।। पूनम शुक्ला

समय रोला छंद समय बड़ा अनमोल

समय रोला छंद समय बड़ा अनमोल, भला क्यों व्यर्थ गवांते।  बोलो मीठे बोल, मान तुम नित  ही पाते।। सूरज देता सीख,समय पर सब कर डालो। छोड़ो ना कुछ काम, नहीं कुछ कल पर टालो ।। पूनम शुक्ला

मनहरण घनाक्षरी खिल उठा आज मन

 मनहरण घनाक्षरी खिल उठा आज मन, नव पात आज वन , नूतन सवेरा देख,  धरा आज खिले रे ।।  हरियाली चहुँओर, सौम्य दिखे नव भोर,  कूजती  कोकिल डाल,  दूर सभी गिले रे।।  पल्लवित तरु लता, भानु अब बता पता,  नगर नगर जन ,  देखो कैसे मिले रे।।  भाद्रपद बदरिया, रस बरसा फुइयाँ , देख मेघ अतिशय,   पात पात हिले रे।। पूनम शुक्ला क्रमांक 26

रोला छंद विषय समदर्शी

 रोला छंद    विषय समदर्शी करके सबसे प्रीत,रहे जीवन समदर्शी। देना हरपल साथ,धरा ज्यूँ पावन सरसी।। होंगे जब प्रिय भाव ,सभी के साथ दुलारे । सबका पाओ मान, जगत में सबके प्यारे ।। समदर्शी बन शान , कार्य तुमको है करना।  रहना सबके साथ, सभी के दुख  है हरना ।। तन पाया इक बार, राह सच की तुम जानो ।  प्रभु पर रख विश्वास,दृष्टि सबकी पहचानो।। निष्कलंक हों पार, ईश से विनती करती । फँसे नहीं मझधार , सदा मन में हूं डरती। जीवन है अनमोल, समझकर कदम बढ़ाते । समदर्शी प्रभु भाव ,सदा हम पर बरसाते।। पूनम शुक्ला

रोला छंद मौसम देता साथ,

 *रोला छंद*💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 मौसम देता साथ, चैन से हम भी सोते । बादल को यूं देख, भला हम काहे रोते । गर्मी या बरसात दिवस हम कैसे काटे,  आते प्रभु तुम याद ,कष्ट हम किससे बाटें।। *शहर बना है ताल,भरे अब  सारे नाले* *आयी अब बरसात,जलज के काम निराले*  आता मौसम शीत, देख ठिठुरे मन मेरा,  पड़ता पाला खूब ,भोर  में रहे अंधेरा।। गर्मी का अब हाल, सभी तुमको बतलायें।  चमके सूरज तेज , शीत हम कैसे पायेँ ।। सुन्दर मौसम खूब ,लगे अब हमको प्यारा। देगा छप्पर फाड़, प्रभू का बहुत सहारा ।। पूनम शुक्ला

मनहरण घनाक्षरी दिवस जीवन चार

 मनहरण  घनाक्षरी दिवस जीवन चार ,कैसे माने हम हार । दमन दुष्कर्म सदा,  करे हम डट के।।  आपका आशीष मात , कृपा करो प्रभु तात,  कीमती समय अति,   काम करें हट के।।  जन्म लिया नर तन , बने नेक हर जन , व्यर्थ बात छोड़ कर,  दोष दूर घट के।।   योग करो स्वस्थ रहो ,राम-राम *नित* कहो , ध्यान जाप करो सदा,  नहीं मन भट के।। पूनम शुक्ला

रोला छंद करते हम सम्मान

 रोला छंद  करते हम सम्मान, सभी  प्रिय पितर हमारे । हैं उनका वरदान, बने हम सबके प्यारे।  रहते हो किस लोक , पता तो देकर  जाते । नित नित आते याद, नहीं हम कुछ कर पाते।  पाया है आशीष ,आपसे हिम्मत पायी। धर्म निभाया खूब, शान्ति गृह सुत   है  छायी। पुरखे आये द्वार,  नमन कर आज मना लो । बिगड़े हैं जो काम, याद कर उन्हें बना लो ।। करना ना कुछ खास, सिर्फ पकवान बनाना। रखना सब कुछ ध्यान,नहींअब  आप भुलाना ।। देकर के हैं मान, आपकी पायी छाया । कैसे भूलू आज, आपकी निर्मल काया ।। रहना होगा साथ , पितर हो आप  हमारे।  सिर पर रख दो हाथ, आप हो  जग से न्यारे।। मान उपकार ईश ,स्वजन है  साथ जब तक। मिले प्रतिष्ठा मान,शान पाओगे तब तक।।   पूनम शुक्ला

सुख दुख मिश्रित बरसात पर दोहे

 सुख दुख मिश्रित बरसात पर  दोहे आया सावन झूम कर ,लेकर के सौगात।  वर्षा की बूंदे पड़े, झूमे  तरु के पात।। सुनकर के बरसात का, मन में आयें भाव।  साथ पकौड़ी चाय के, कागज की हो नाव ।।  मन प्रमुदित अब हो गया, सुन बूंदों का शोर ।  जीवन में हो  ताजगी, आएँ  सुंदर  भोर।।  सावन में हम झूलते, झूला तरु पर डाल । खेतों को  अब मेघ ने , बना दिया है ताल।।  कैसे सावन देखता, धरती का अब हाल । अतिशय बारिश धूप से ,धरा हुई बेहाल।।   छाये मेघा देखकर , वरखा की है आस । संग पवन अब चल दिये ,कंटक बनती घास।।  हिय कंपन करने लगे ,आती जब बरसात । सिर पर छप्पर  है नहीं, कैसे बीते रात।।  मंदिर में अब बैठकर ,ईश भजूँ दिन रात । सुन लो मेरी प्रार्थना, बंद करो बरसात।। पूनम शुक्ला
हास्य रस दोहे सत्रह का मैं हो गया, लंबा जैसे तार। अब माँ  तुमसे क्या कहूँ ,ला दो सुन्दर नार।। पढ़ना अब भाता नही, देख सभी का हाल। पत्नी  की हो नौकरी,बदले मेरी चाल।। काम काज करता नही ,दूल्हा दियो बनाय। मोटी दौलत मांग के,घर भी लिया बसाय।। साली ऐसी है मिली,जैसे बेला फूल।   गोभी  जैसा तन  दिखे, मन से बीबी  शूल।। पढ़ लिख कर मैं क्या करूँ ,नेता लागे नीक। पैसा अब मिलता रहे,काम भला तकनीक।। चार चार हो गाड़ियां, सेवक हो दस बीस, पीकर प्याला सोमरस, माँगा करते फीस।। नेता घर में हो अगर,मानो तुम  उपकार। देकर प्रभु को घूस तुम,करना बेड़ा पार।। पूनम शुक्ला
  हिंदी तांटक छंद मिश्री जैसी मीठी हिंदी, लगती सबको प्यारी है। *बोली इसकी मधुर मनोरम,सब कुछ इस पर बारी है* । हर भाषा की जननी हिंदी, सब की राजदुलारी है।  संस्कारों की भाषा हिंदी, सारे जग से न्यारी है।।  सबसे प्यारी इसकी बोली, बसती जान हमारी है। तकनीकी विज्ञान से पोषित, सुरभित धरती सारी है।।  अनुपम वाणी है मनभाती ,जीवन सुरभित करती है । अलंकार से सजी हुई यह, मोहक सी अब लगती है । भेदभाव ना आता करना,पावन निर्मल पानी है। अद्भुत अविरल मनमोहक सी, यह जानी पहचानी है ।। एक नहीं अब दिवस हो हिंदी, हर दिन अपनाना होगा। *देकर  के सम्मान इसे युग ,हिंदी का लाना होगा*।।  हिंदी है पहचान देश की, सरल राष्ट्र की वाणी है।  गर्व हमेशा  है हिंदी पर , कहते हम कल्याणी है।। *पाया है आशीष बहुत ही , नव पथ की लाचारी है*, वेद रिचा की पोषक हिंदी, अपनों से वह हारी है।। राजकाज की भाषा बनकर ,झंडा फहराना होगा। *सुन्दर छंदों की रचना कर,गान मधुर गाना होगा **।। पूनम शुक्ला

परिचय नाम : पूनम शुक्ला

  परिचय नाम    :   पूनम शुक्ला शिक्षा : एम ए ( हिंदी,संस्कृत ) बी0 एड  अभिरूचि : पठन  - पाठन , लेखन ,  व्यवसाय : प्रशिक्षित स्नातक शिक्षिका (संस्कृत ) लेखन विधा  :  गद्य ,पद्य/ कविता / निबंध/ प्रस्तुति : फेस बुक पर निरंतर रचनाएँ ,ब्लॉग और यूट्यूब पर ,तथा अन्य साहित्यिक मंच पर भी कविता पाठ का सौभाग्य मिला। प्रकाशित कृतियां-अमृत विचार, लोक सचेतक , आज, कोल्ड फील्ड मिरर  इत्यादि समाचार पत्रों में अनेक रचनाएँ प्रकाशित। रसना, दिल की तरंग, हम भारतीय है,  सहोदरी सोपान 7 , कलम चलने दो ई पत्रिका,  अभ्युदय मासिक पत्रिका ,अंचल मासिक पत्रिका ,काव्य मंजरी केंद्रीय विद्यालय  संगठन ,अभिव्यक्ति आदि  साझा संकलन  में अनेक रचनाएँ प्रकाशित।

दोहे विद्या दो मां शारदे

 आज का अभ्यास नमन मंच🙏🙏🙏🙏 दोहे विद्या दो मां शारदे ,बाँटू नित भरपूर । विद्या से जीवन चले, नयनों का है नूर ।। शुभ्र ज्योत्स्ना रख के माँ, दो ऐसो वरदान,   भाव विमल मुझको मिले ,होवे तेरो मान।। कलुषित मन न हो मेरा ,तम का करो विनाश,  उज्ज्वल मन मेंरा रहे, भर दो ज्ञान प्रकाश ।। माया मोह में फँस  के, भूला तेरो नाम , कर दूं बुद्धि बलवती , करूँ  नेक नित काम।। रहे मधुरता कंठ में ,मन में निश्चल प्यार । शब्द सृजन ऐसा करूँ ,बरसे अमरत धार।। पूनम शुक्ला

हास्य मनहरण घनाक्षरी वानर है। र,

 मनहरण घनाक्षरी हास्य वानर है पेड़ पर,खाये फल तोड़ कर, उधम मचाये बड़ा, अब तो भगाइये।। डाल डाल कूद कर,देखो आंख मूँद कर, छीन लिया फल मीठा, डंडा तो मंगाइये।। समझे है हनुमान,  आंकें नहीं कम शान, खो खो कर धमकाये, कोई तो डराइये ।। बुलावा मगर आया,सज धज वह आया खूब खाये फल मीठे, कलेजा दिलाइये।। पूनम शुक्ला क्रमांक 28

तांटक छंद सुभाष चंद्र बोस देश प्रेम की दिव्य ज्योति

तांटक छंद  सुभाष चंद्र बोस  देश प्रेम की दिव्य ज्योति जो, वीर सुभाष जलाई थी । प्रेम देश से करने वालों ,ने तब गोली  खाई थी  जाया किया वीर सुत उसने ,मां की गजब कहानी थी।  गोरों से भिड़कर सुभाष ने, याद दिलादी नानी थी।।  राय बहादुर का तमगा जो, पितु सुभाष लौटाया था , क्रांतिकारी पिता के निर्णय  , ने तब रंग जमाया था।। भारत मां के वीर पुत्र ने, जगत किया उजियारा था । शुभ्र वर्ण की माला  में ज्यूँ ,चमका मनका प्यारा था।। विलक्षण बुद्धि का बालक वह, कभी न डरने वाला था। भाग्य बदलना है  भारत का ,उसने प्रण कर डाला था मैं  तुमको आजादी दूंगा ,ऐसा उसने बोला था ।  देना होगा  खून  मुझे बस , राज मगर यह खोला था।। आजाद हिंद फौज गठन  कर ,दिया जय हिंद  नारा था, वेश बदल कर धूल चटाने,सिवा ना कोई  चारा था।। गोरों के चंगुल ना आया,ऐसा वह सेनानी था जीवन दांव लगाया उसने, देश भक्त बलिदानी था।। पहनी मोटी खाकी उसने,नहीं किसी की मानी है । लगे पता तो हमे बताना,लिखनी अमर कहानी हैं।। पूनम शुक्ला

तांटक छंद महाराणा प्रताप

  तांटक छंद  महाराणा प्रताप कुंभलगढ़ को किया सुशोभित, नाम मनोहर था काकी ।  राणा सांगा के  ये वंशज, राज्य सनातन था बाकी।।  काल मुगल था जन्मा जब वह, अंधकार हरने आया।  धन्य हुआ राणा का वंशज, उजियारा करने आया।।  एक लिंग का भक्त निडर था, लालच में वह ना आया। * *साहस का पर्याय बना वह ,नाम अमरता हाँ पाया*।। एकलिंग भगवान शपथ ली,अकबर बात न मानेंगें। आयें कितने भी संदेशा ,तोपे तो हम तानेंगे।।  बरछी ढाल कटार साथ में ,रुख पवन ओर मोड़ा था। मुगलों में विध्वंस मचाया, चेतक चंचल घोड़ा था।।    उदय सिंह ने छोटे बेटे, को युवराज बनाया था । वीर मराठी भक्तों ने अब ,ना दिल से अपनाया था।। होनी होती बलवान बड़ी ,राणा ताज दिलाया था, जगमल भूल चुके राणा थे,वह ना कभी भुलाया था।। हल्दीघाटी युद्ध छिड़ा जब ,चेतक संग निराला था । *एक लाख सेना मुगलों की,  राणा से  अब पाला था* ।। अद्भुत साहस शौर्य अनोखा, राजपूत अभिमानी था । पहन मुकुट धरा छत्र मस्तक, मानसिंह बलिदानी था।।  मुगलों की मैदानी तोपे ,रण में ही जब बोली थी।  वीर मराठा राणा की तो, नहीं संग अब टोली थी।। ...

मनहरण घनाक्षरी तीन नगण से प्रारंभ

 मनहरण घनाक्षरी तीन नगण से प्रारंभ 🌹🌻🌹🌸🌻🌹💦🌹🌻🌸 कमल गुलाब खिले ,जूही गेंदा सब मिले   देखकर सुंदरता,  मौसम महके रे।।   बेला चंपा नाग चंपा, गुड़हल बचनाग,   अबोली चमेली नीम  विहग चहके रे।। मोंगरा कामिनी फूल,कनेर नलिनी पीली, वासंती जंगली मूँग, मानस बहके रे।। पलाश मेहंदी गुल,गुल बहार केतकी सूर्य मुखी डेहलिया, चमन कहके रे।। पूनम शुक्ला

*आदर्श शिक्षक*.... जो कुछ भी सिखाये वह शिक्षक है । जो साक्षर बनाये वह शिक्षक है ।जो किसी स्थिति , घटना या प्रवेश को समझने योग्य बनाये वह शिक्षक है ।जो दुनियादारी को समझने में सहायता करे वह शिक्षक है ।लेकिन जो सदमार्ग दिखाए ,जो सात्विक आचरण सिखाये ,जो शिष्य के जीवन की चिंता करें उसके चरित्र को चिन्ता करे ,जो देश हित मे मानवता के हित की राह पर अग्रसर करे वही तो गुरु है ,वही आदर्श शिक्षक है और सच्चा मार्ग दर्शक है । शिक्षक वह होते हैं जो अपनी ज्ञान की ज्योति से हमें प्रकाशित करते हैं और हमारा मार्गदर्शन करते हैं। यह किसी भी आयु वर्ग के लोग हो सकते हैंऔर इनका हमारे जीवन को सफल बनाने में बहुत बड़ा योगदान होता है। इतिहास में जितने भी महान पुरुष हुए है सभी अपने शिक्षकों को याद करना नही भूलते है । धरती पर मनुष्य जब आया तो उसे भगवान का बोध नहीं था, वह गुरु ही है जिसने मनुष्य को भगवान से अवगत कराया। इस लिये पहले गुरु की पूजा की जाती है और उसके बाद भगवान की। हमारे हिंदू मान्यताओं में शिक्षक को भगवान से भी उपर माना जाता है। किसी भी समाज को विकसित करने के लिये, यह महत्वपूर्ण है कि वहां के लोग शिक्षित हों और एक शिक्षक ही ऐसे समाज का निर्माण कर सकता है। वे बच्चों को शिक्षित करते हैं मनुष्य चाहे जितना भी बड़ा क्यों न हो जाए, उसे कभी न कभी एक मार्गदर्शक की आवश्यकता जरूर पड़ती है और आपका मार्गदर्शक ही आपका शिक्षक व गुरु है। गुरु की सीमा केवल स्कूली पुस्तकों मात्र तक सीमित नहीं होती, जरूरत पड़ने पर वे सच्चे दोस्त भी बन जाते हैं और आपकी हर प्रकार से सहायता करते हैं ऐसे तो हर वह व्यक्ति शिक्षक कहलाता है जिससे आप कुछ सीखते हैं, चाहे वह आपकी मां ही क्यों न हो। मां किसी भी व्यक्ति की पहली शिक्षक होती है जो उसे चलना, बोलना जैसी मूलभूत आवश्यकताएं सिखाती हैं। अध्यापक वह व्यक्ति है जो आपको स्कूल में शिक्षा देते हैं, गुरु जो जीवन संबधी ज्ञान देते हैं और शिक्षक इन दोनो के मिश्रण को कहते है, जो आवश्यकता पड़ने पर हर प्रकार से आपको अज्ञान के अंधेरे से बाहर निकालते हैं। हम अपने शिक्षकों का जितना भी गुणगान करें कम ही है और छात्रों के जीवन मे उनके स्कूली शिक्षकों का बहुत योगदान होता है। एक अच्छा गुरु सदैव अपने शिष्य को आगे बढ़ने के लिये प्रेरित करता है। हमें सदैव अपने गुरु का आदर करना चाहिये और सच्चे मायनों मे गुरु का आदर तभी हो सकता है, जब हम उनके बताए गए मार्ग पर चलें। एक शिक्षक होना बहुत कठिन कार्य है और नमन है कुछ लोग जो शिक्षक का पेशा चुनते हैं वाकई में काबिले तारीफ होते हैं। जो अपने कंधों पर देश का भविष्य संवारने का दायित्व लेकर चलते हैं। प्रश्न उठता है हम पांच सितम्बर को ही शिक्षक दिवस के रूप में क्यों मनाते है?इसका उत्तर यही है कि जब डा. सर्वपल्ली राधाकूष्णन जी सन् 1962 में देश के राष्ट्रपति पद पर सुशोभित हुये तो उनके छात्रों एवं मित्रों ने उनसे उनका जन्म दिन मनाने की अनुमति माॅंगी । वह एक दर्शन शास्त्री थे जो दर्शन शास्त्र के प्राध्यापक के रूप में मद्रास प्रेसिडेंसी कालेज ,मैसूर यूनिवर्सिटी,कलकत्ता यूनिवर्सिटी और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पढ़ाया ।उनके जैसा ज्ञानी विद्वान दार्शनिक बड़ी मुश्किल से होते हैं ।ज्ञान के विपुल भंडार , उन्होंने अपना जन्म दिन सभी विद्यालयों में शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की अनुमति प्रदान की ।तभी से पांच सितम्बर 1962 से इस दिवस को सभी विद्यालयों में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा । उनके अनुसार व्यक्ति के जीवन में माता पिता के पश्चात शिक्षक का ही वह स्थान होता है जो अपने छात्र को सही और गलत के बीच का अंतर स्पष्ट करते हुये उसे मार्ग दिखलाता है । वह उनके अंतस के अज्ञान के अन्धकार को नष्ट कर ज्ञान का दीप प्रज्वलित कर आत्म दीपोभव का ज्ञान देकर जीवन को जीने की कला सिखलाता है । आदर्श शिक्षक स्वयं का हित नही देखता । उसका लक्ष्य , उसका केंद्र ,उसका ध्यान सब कुछ विद्यार्थी होता है । एक आदर्श गुरु ही युग का निर्माण कर सकता है क्योंकि युगनिर्माण की कठिनाइयों को सहने की शक्ति केवल उसी में होती है जो एक माँ में होती है । एक माँ या एक आदर्श शिक्षक ही अपने शिष्य के विकास से प्रसन्न होता है । आदर्श शिक्षक के शरीर की आभा या कांति इतनी सशक्त होती है कि शिष्य उससे बिना प्रभावित हुए रह ही नही पाता और यह परिणाम शिक्षक के अभ्यास और तप के कारण ही सम्भव है ।जो शिष्य किसी आदर्श शिक्षक से शिक्षा ग्रहण करते है वे ही सर्वपल्ली राधाकृष्णन , महात्मा गांधी , टॉलस्टॉय , रामकृष्ण परमहंस ,विवेकानंद जैसी विश्व प्रसिद्ध हस्तियॉं बनती है । अच्छे शिक्षक के मूलभूत गुण (१) अच्छा शिक्षक वह है जो ताउम्र सीखता रहता है और अपनेछात्रों से भी सीखने में परहेज नही करता । (२) पुस्तकें वह साधन हैं जिनके माध्यम से हम विभिन्न संस्कृतियों के बीच पुल का निर्माण कर सकते हैं । (३)शिक्षा का परिणाम एक मुक्त रचनात्मक व्यक्ति होना चाहिए जो ऐतिहासिक परिस्थितियों और प्राकृतिक आपदाओं के विरुद्ध लड़ सके । (४) भगवान की पूजा नही होती बल्कि उन लोगों की पूजा होती है जो उनके नाम पर बोलने का दावा करते हैं । (५)शिक्षक वह नही जो तथ्यों को जबरन ठूंसे बल्कि शिक्षक वह है जो उन्हें आने वाली चुनौतियों से लड़ने के लिये तैयार करे । (६) खुद की तुलना किसी और से कभी न करें ,क्यों कि भगवान ने आपके जैसा किसी को भी नही बनाया । (७) संगीत सुनकर ज्ञान नहीं मिलता , मंदिर जाकर भगवान नही मिलता ।पत्थर तो इसलिये पूजते हैं लोग ,क्यों कि विश्वास के लिये इंसान नही मिलता । (८ आपके पास जो भी उत्तरदायित्व है उसे समय से पूर्ण करें । (९ जीवन की सबसे बड़ी खुशी उस काम को करने में है ,जिसे लोग कहते हैं कि यह तुम्हारे बस का नहीं ।चुनौती स्वीकार कर आगे बढ़ो । (१०) इंसान को निखारने के लिये कठिनाइयों की आवश्यकता होती है क्यों कि सफलता का आनंद उठाने के लिए मुसीबत उठानी ही पड़ती है

 *आदर्श शिक्षक*....        जो कुछ भी सिखाये वह शिक्षक है । जो साक्षर बनाये वह शिक्षक है ।जो किसी स्थिति , घटना या प्रवेश को समझने योग्य बनाये वह शिक्षक है ।जो दुनियादारी को समझने में सहायता करे वह शिक्षक है ।लेकिन जो सदमार्ग  दिखाए ,जो सात्विक आचरण  सिखाये ,जो शिष्य के जीवन की चिंता करें उसके चरित्र को चिन्ता करे ,जो  देश हित मे मानवता के  हित की राह पर अग्रसर करे वही तो गुरु है ,वही आदर्श  शिक्षक  है और सच्चा मार्ग दर्शक है ।  शिक्षक वह होते हैं जो अपनी ज्ञान की ज्योति से हमें प्रकाशित करते हैं और हमारा मार्गदर्शन करते हैं। यह किसी भी आयु वर्ग के लोग हो सकते हैंऔर इनका हमारे जीवन को सफल बनाने में बहुत बड़ा योगदान होता है। इतिहास में जितने भी महान पुरुष हुए है  सभी  अपने  शिक्षकों  को याद करना नही भूलते है । धरती पर मनुष्य जब आया तो उसे भगवान का बोध नहीं था, वह गुरु ही है जिसने मनुष्य को भगवान से अवगत कराया। इस लिये पहले गुरु की पूजा की जाती है और उसके बाद भगवान की। हमारे हिंदू मान्यताओं में शिक्षक को भगवान ...

शिक्षक आप जैसा गुरु मिला

 शिक्षक  आप जैसा गुरु मिला,मन पुष्प जैसा खिला,  गुरू को नमन करें,  दोनों कर जोड़ के ।।  आशीर्वाद प्रभु देना ,पाप सब हर लेना,  मन का तमस मिटा , द्वेष भाव छोड़  के।। करे नित आराधना, नियमित हो साधना, छंद भाव मन जगे, अहंकार तोड़ के ।।   ज्ञान गंगा भर कर,कुमति को हर कर,  सत्य का वरदान दो,  तम घट फोड़ के ।। पूनम शुक्ला
  कुकुभ छंद गाँव जवाली जिला सतारा,  मालसुरे   तब है आया पाकर  पावन   धर्म   सनातन,                               मातृभूमि को  हरषाया।। *शिवा का  वह मित्र घनिष्ठ था*, कहते  उसको सब ताना देश भक्ति थी उसके अंदर,   *केसरिया सचमुच बाना*।। किला  रहा जो  सबसे विस्तृत,    *जीजा का हैं दिल डोले*। हासिल करना वापस इसको, थे आँखों मे बस शोले।। पांच हज़ार मुगल थी सेना, किला भेद अब करना था। रहे सिपाही संग तीन सौ , नही किसी से डरना था।। ताना जी की पूरी सेना, प्राची में हैं जमकर बोली उदयभान रखवाल किले का, दागी अब  डटकर  गोली।। राजपूत की ढाल टूटना,  सुयश वीरगति अब पाना। साहस,शौर्य वीर का स्वामी, जग में हुआ अमर ताना।। पूनम शुक्ला

कुकुभ छंद गन्धर्व सेन की दुहिता

 सुधारोपरांत आज का अभ्यास कुकुभ छन्द कुकुभ छंद गन्धर्व सेन की दुहिता थी, वीर रतन की पटरानी।  सुनी शौर्य की गाथाएँ हैं,लगती जानी पहचानी।।  चित्तौड़गढ़ के नृप रतन थे , जिनकी थी तेरह रानी,  पहुँचे पद्मिनी स्वयंवर में, आये बनकर अभिमानी।। रतन सिंह को प्रिय पद्मिनी,  सुंदरतम है यह नारी।  साहस बल की धनी बहुत वह, शौर्य भरी सब पर भारी।। सुनी पद्मिनी की सुंदरता ,खिलजी का मन भरमाया ।  बेचैन  हुआ ख़िलजी का मन , विधि के हैं क्या मन भाया। दुर्दांत आततायी ख़िलजी , ने सुनी जब रूप गाथा। कैसे मिले पद्मिनी मुझको, ठनका उसका तब माथा।।  सुना रतन को बंदी हैं अब,रानी ने  प्रण  कर डाला।  *जौहर कर भस्म हुई रानी* ,हुआ  मुगल का मुँह काला ।। *सुनी  पदमिनी जौहर गाथा* ,परिचित सबकी प्रिय रानी । गयी गोद में अग्निदेव की ,ओढ़े चूनर अब धानी ।। पूनम शुक्ला

मनहरण घनाक्षरी रोजाना पटल सजे

 मनहरण घनाक्षरी  रोजाना पटल सजे ,कभी नही हम तजे, नमन वंदन करें, गुरुको मनाइये ।। आपकीहै छत्र छाया,जगत केवल माया, दूर करें अंधकार, कभी ना सताइये।। बनेहै प्रेरक आप,धूप दीप शीत ताप, सीखनेको हैंआतुर, आपही सिखाइये।। भाव पक्ष कला पक्ष,किसी मेहै नहीं दक्ष, पूनमकी  हैप्रार्थना, हमको बताइये।।

कुकुभ छंद राजस्थानी मिट्टी

कुकुभ छंद राजस्थानी मिट्टी पावन, रानी का है जयकारा । सोलह हजार क्षत्राणी का,विधि ने विधान कब टारा।। चेतन राघव चित्रकार था,खिलजी को तब बतलाया। रतन सिंह की रानी सुंदर,बिंब उसे है दिखलाया।। रानी को पाने को आतुर ,जोर लगाया अब सारा । राजस्थानी मिट्टी पावन,रानी का है जय कारा।। चाल चली तब खिलजी ने इक, रतन सिंह से है यह बोला, रानी कितनी सुंदर है यह,दर्शन को है मन डोला । सुनते ही यह रतन सिंह का ,चढ़ा  भयंकर अब पारा , राजस्थानी मिट्टी पावन, रानी का है जयकारा।। धोखे से है खिलजी ने तब ,रतन सिंह को पकड़ा था , और पद्मिनी पाने को तब, जाल बुना बन मकड़ा था। बुद्धि बल की स्वामिनी रानी, बन चंडी किया किनारा। राजस्थानी मिट्टी पावन, रानी का है जय कारा ।। देशभक्त दो गोरा बादल, बन भटक रहे बनवासी। राजस्थान की रक्षा खातिर, पहुंची जैसे बन दासी। हाथ जोड़कर विनती कर ली,पाना है अब छुटकारा, राजस्थानी मिट्टी पावन रानी का है जयकारा।। देशभक्ति की ज्वाला दिल में ,धधके मन में अब शोला,*मातृ भूमि की रक्षा खातिर,पहना है पावक चोला*। *देना साथ बहन का अब तो ,गोरा का अब प्रतिकारा* ।। राजस्थानी मिट्टी पावन ,रानी का है जय कार...

कुकुभ छंद भारत की रज कण

कुकुभ छंद भारत की रज कण में साहस, नमन वीर का करते हैं,  भारत का जो मान बढ़ायें , कथा उन्हीं की गढ़ते हैं ।  पितु विश्वनाथ माता राधा, का बेटा था अलबेला,  बाजीराव पेशवा जिसका, युद्ध बना था प्रिय खेला।।  रग-रग में था साहस जिसके, शत्रु कभी ना टिक पाया,  ढ़ेरो युद्ध लड़े जीवन में, किला शत्रु का सब ढाया ।।  नीला गंगा सारंगा औ, औलख उनके प्रिय घोड़े , अद्भुत रण कौशल के दम पर, दुश्मन को भी कब छोड़े।।                या देख पवन का  रुख़ मोड़े ।। पूनम शुक्ला

मनहरण घनाक्षरी रवि आये पूर्व नित

 मनहरण घनाक्षरी रवि आये पूर्व नित , बर्षा गिरे कृषि हित , अवध  है जन्मे  राम , *दूत हनुमान है* । हवा बहे कण कण , बाल्मीकि की रामायण , गांधी छपे देश मुद्रा  *यही पहचान है* । सैकड़ो कवित्त पद ,देश सीमा वीर  रत ,  विनायक गजमुख , *सूप  जैसे कान  हैं*।   निवास बरेली यहॉं ,गुरु वत्स पूजे वहाँ , वर्ण पर वीणा पाणी, *मैया विद्यमान है* पूनम शुक्ला क्रमांक 28

मनहरण घनाक्षरी विषय हल षष्ठी बलराम जन्म आया

 मनहरण घनाक्षरी विषय हल षष्ठी बलराम जन्म आया ,हरछठ खूब लाया , भादो  जाते सूने सूने ,  बूंद तरसाएँ रे।। बलराम कान्हा भाई, शक्ति दोनों खूब पाई, असुर संहार कर,  जग हरषाऐं रे ।। चहुँ ओर खुशी छाई,नगर बधाई आई, मधुर उमंग लिए, मन सरसाएँ रे ।। नर नारी सब आये ,जन्म गीत खूब गाये पावन त्योहार आया, पुष्प बरसाएँ रे।। पूनम शुक्ला

सार छंद पर्यावरण

 सार छंद पर्यावरण आओ मिलकर उपवन में हम, सुंदर पेड़ लगाएं । जिसके नीचे बैठ पथिक सब, शीतल छाया पाएँ।।  नीम आँवला तुलसी बरगद, के हम लाभ बतायें ।  एक से बढ़कर एक औषधि, गिन गिन के समझायें।। फल फूल और औषधि देते, देते नहीं अघाते।  बदले में तरु नहीं चाहते सब कुछ ही सह जाते।।  कैसा भी मौसम हो वृक्ष ,हमसे कुछ  ना कहते ।  जगती का कल्याण करें औ, धूप शीत सब सहते।। पर्यावरण बचाने की अब, शपथ हमें है लेनी । करे धरा को हम संरक्षित, सीख सभी को देनी।।  पेड़ काटकर हमने तो हैं, पशुओं का घर छीना । नहीं जानते हम भी क्या है, पंछी को भी जीना।। पूनम शुक्ला

सार छंद खाकर माखन मिश्री

 सार छंद   खाकर माखन मिश्री कान्हा,बाबा  को बतलाते । सवा लाख है तेरी गैया, माखन हम ना पाते ।। स्वयं करूंगा दुष्टों का वध, ऐसे कैसे कह दूँ , मार पूतना पटक पटक कर ,किला सभी का ढ़ह दूँ।।  दूध दही औ माखन देती , सबसे अच्छी मइया।  नित नित लाड़ लड़ाते रहते ,जो है मेरे भइया।। खास दिवस था गया चराने, अपनी प्यारी गैया । लीला थी कुछ मन में उनके, करनी ता ता थैया।। खेलें  गेंद आज हम मिलकर, कान्हा यूँ समझाते।  करते मस्ती नदी किनारे, घर पर नहीं बताते।।  खेल खेल में गेंद गई अब, उनकी यमुना जल में । भेज दिया अब कंदुक लाने ,सब ने मिलकर छल में । गई सूचना घर पर उनके ,मां बाबा सब आएँ। कालनाग को वश में करके, कन्दुक कान्हा लाएँ ।। पूनम शुक्ला