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संस्मरण बिस्तरबंद

 संस्मरण जीवन में कभी-कभी ऐसा घटित हो जाता है कि आप उसको कभी भूल नहीं पाते हैं ।तथा इस आपा धापी भरी जिंदगी में भी उसका स्मरण  अनायास आपको आ ही जाता है ।ऐसा ही एक वाकया मेरे साथ हुआ ,जिससे मैं बहुत प्रभावित हुई। बात है सन 1997 की। मैं केंद्रीय विद्यालय अगरतला से स्थानांतरित होकर केंद्रीय विद्यालय जोशीमठ उत्तराखंड जा रही  थी। हरिद्वार तक ट्रेन का सफर बहुत अच्छे से गुजरा और उसके बाद मुझे हरिद्वार से बस द्वारा जोशीमठ जाना था ।लगभग 12 घंटे का पहाड़ी घुमावदार सफर अगर आप को चक्कर आते हैं,तो बहुत मुश्किल हो जाता है । कुछ मेरा भी यही हाल था। बस में आंखे मूंद कर  बैठना और गंतव्य पर पहुंच कर आंखे खोलना कुछ ऐसी स्थिति मेरी हो गई थी। मेरे पास एक अटैची तथा एक बिस्तर बंद था जिसमे नए रजाई गद्दा के साथ मेरे व मेरे   बच्चे की पुस्तकें  कापियां,डायरी , कपड़े,खिलौने स्लीपर तथा थोड़े बहुत रसोई के बर्तन इत्यादि रखे थे ।इतना सारा सामान हो जाने के कारण वह  आवश्यकता से अधिक भारी हो गया था । बस  स्टेशन पर पहुंचकर चालक तथा कंडक्टर ने मेरा बिस्तर बंद छत के ऊपर रख दिया त...