श्रृंगार छंद


नेह लौ से दमके मन दीप,

मान लो ज्यूँ  मोती  तन सीप ।

तिमिर घन का होता है नाश,

हवा भी दूषित हो कम सांस।।


 देख  कर वसुधा का ये हाल,

खिन्न मन से काटे  अब साल।

धरा रोपे तरु फूकें जान ,

करें प्रण लेकर मन में ठान।।


 बड़ों से मिले सदा उपहार ,

अनुज के लिए रहे मन प्यार।

 दीप सा दमके सब घर बार,

भानु सा खिले निखिल संसार।।


पूनम शुक्ला

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