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Showing posts from May, 2021

खुद को घर में कैद कर लो ।।

 प्यारे बच्चों बस कुछ दिन , और सब्र कर लो । बाहर बैठा है राक्षस , खुद को घर में कैद कर लो ।। अब करना विश्वास , नया सूरज भी चमकेगा । फूलों की सुगंध से यह , गुलशन भी महकेगा ।। अभी घर पर रहकर, डिजिटल लाइब्रेरी से पढ़ना । चंपक नंदन शक्तिमान के , किरदारो से मन भरना।। गूगल क्लासरूम से , अब और न पढ़ना होगा । सुंदर काले बोर्ड से ही , जीवन गढ़ना होगा।। सुबह की प्रार्थना , पंक्ति बद्ध कक्षा में जाना । चॉक के बहाने गैलरी में , दोस्तों से बतियाना ।। गणित में पाइथागोरस की , प्रमेय को समझना । अकबर और हुमायूँ की , जन्मतिथियों में उलझना ।। बिना बालक के रूप याद किए, संस्कृत कक्षा में जाना । और फिर वही पुराने श्लोकों को,  लयबद्ध हो सुनाना ।। मध्यांतर में दोस्तों संग , कैंटीन में समोसे खाना । बतियाते और खाते समोसे , विद्यालय के चक्कर लगाना।। खेल के कालांश में , क्रिकेट में छक्के लगाना । खेल में मग्न होकर , घंटी को अनसुना कर जाना ।। सब दिन वापस आएंगे , थोड़ा और सब्र कर लो । बाहर बैठा है राक्षस , खुद को घर में कैद कर लो।।

मन मंथन

 सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।। सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े। इन्हीं मंगलकामनओं के साथ आपका दिन मंगलमय हो मन – मंथन निश्चित ही सुंदर नवल ,प्रभात होगा , कालरात्रि का अति शीघ्र ,अवसान होगा । क्यों करते हो चिंता रे मनुज , पुनः सुख मय जीवन का ,आगाज होगा ।। व्यथित मन से ही सही ,हिम्मत ना हारना होगा , नियति का खेल मान, दामन उम्मीद का थामना होगा । प्रकृति के विरुद्ध जाकर , विकसित हुए हैं हम , संरक्षित कर वृक्ष को ,धरा के अस्तित्व को बचाना होगा।।  क्या खोया क्या पाया , मन मंथन तो करना होगा , क्षमा मांग सृष्टि से , पर्यावरण को सहेजना होगा । जाने अनजाने में की है, गलतियां बहुतेरी , मिला अवसर सुधरने का, जीवन बदलना होगा ।। भीषण दुश्वारियों का, मुकाबला तो करना होगा , बीती ताहि बिसार के, आगे की सुध लेना होगा । सौंदर्यीकरण के नाम पर काटें है नूतन वृक्ष भी, अब पुनः इस धरती को हरियाली से रंगना होगा ।।

मातृ देवो भवः

 मातृ देवो भवः जगत की सभी माताओं को मेरा नमन  मैं तेरे जैसा बनने का  करती हूं रोज प्रयास माँ , गिर गिर के संभलती हूं  पाती हूं तेरा अहसास माँ ।।  माँ  माँ जपते जपते  थकते न शब्द मेरे , उन शब्दों में घुल जाने का  करती हूं नित्य  कयास  माँ ।। केवल स्वप्निल अहसास नहीं , रोम रोम में बसी मधुर आस है माँ।  सात स्वरों से निकली लहरी , सुरमय करदें सारी कायनात माँ।। निशिदिन सही गलत का अर्थ  , सलीके से सिखलाती है हर माँ  । संतति को कड़ी धूप वर्षा से,  स्नेह आंचल से बचाती है माँ ।। खुद सहकर लू के थपेड़े भी,  प्रेम का सागर बन जाती है माँ,  जग कर गुजारी है  कितनी रातें,  और फिर सपने में आ जाती माँ।।  नश्वर संसार का सबसे , शाश्वत शब्द है माँ । मातृ देवो भव की गूँज से गुंजायमान है सारा जहाँ माँ।। मेरी आशा है , विश्वास है  आस्था का प्रवाह है माँ ।  केवल सृजन हारी न समझो , आपदा में शीतल बयार है माँ ।। खून से अभी सिंचित कर  सुंदर जीवन दायिनी है माँ , दिन भर करती काम , लेती ना तनिक आराम माँ।। पुष्पों...