श्रृंगार छंद
सुनी है हिय से अब पदचाप,
तुम्हीं ने छोड़ी दिल में छाप ।
बात ये कहनी है चुपचाप ,
प्यार की गहराई मत नाप।।
समझ ना पाए हिय की बात,
दिवस ना कटे कटे ना रात।
रूठ कर मारा दिल में तीर ,
बहें है बहुत नैन से नीर।।
मीन भी बिन पानी बेकार,
भवर को कलियों से है प्यार।
बाग में नाचे जैसे मोर।
प्रीत की मन में रहती डोर ।।
पूनम शुक्ला
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