घनाक्षरी अकेले पहाड़ पर

गिरि शिखर चूमने, चले अकेले घूमने ,

वहां बसे शिव मेरे,

पूजूँ  कर जोड़ के।।


 तृण चुभे पग पर ,कंकण ये पथ पर,

 पथरीला मार्ग यहां,

 जाऊं  सब छोड़ के।।


 हिंसक है जीव वहाँ,  शिव मेरे  साथ यहाँ,

 भूख लगी जोर अब ,

खाऊं फल तोड़ के ।।


कदम बढ़ाते चल , आगे पग रख कर ,

पीछे नहीं जाना अब, दृष्टि नहीं मोड़ के।।


पूनम शुक्ला

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