दोहे देश धर्म



करो समर्पित  देह को ,नहीं करो अभिमान।

आयें देश के काम जो , श्रेष्ठ  वहीं इंसान।


अपना ही सोचो नहीं, जग का करो विचार ।

जो जगत का सोच लिया , नहीं रहे व्यभिचार।।




जिसने मानव तन दिया, मानो तुम उपकार।

 धर्म की बलिवेदी पर, कर दो जीवन वार।।



मेरा मेरा क्यों करे,सब कुछ लिया उधार।

गिन गिन कर देना पड़े, यही जगत व्यवहार।।


करो समर्पित देव को ,समझ उन्हीं की चाल।

करें नेक कुछ काज हम,चाहे हो जिस हाल।।


पूनम शुक्ला

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