लावणी छंद मानव


लावणी छंद



कितने जन्मों के पुण्यों से,  मानव ने नर तन पाया।

 कर्मों के अनुसार जगत में, सुख-दुख की पड़ती छाया।।

परम पिता के प्यारे बच्चे,माँ के बहुत दुलारे हैं।

 लेकिन फिर भी आपस में वे ,द्वेष भाव  मन धारे है।।



मानवता की रक्षा खातिर, ,हमको प्रण करना होगा।

देख विपत्ति जगत में सब की ,कष्ट सभी हरना होगा।।

विश्व बने परिवार हमारा, मन भीतर ना घाव  रहे।

 भाईचारा प्रबल रहे अब, अपनापन का भाव रहे।।



तोड़ दीवार जाति धर्म की, नेक राह पर आयेगा।

करें प्रेम जन-जन से जब वह ,तब मानव कहलायेगा।

दया धर्म हो मन में अपने ,सब धर्मों की सीख यही ,

कलुष विचार त्याग दो सारे, मानवता की रीत यही।।


पूनम शुक्ला


अति सुंदर सृजन के लिये बधाई आपको पूनम जी भाव व गेयता की दृष्टि से भी उत्तम रचना👏👏👌👌🙏🙏

Comments