रोला छंद मिल जुल कर सब बैठ


रोला छंद 

मिल जुल कर सब बैठ,प्यार से खाना खाते।

सुख दुख अपना रोज,किसी से कह सुन पाते।।


गुल्लक  को अब फोड़, सभी की खुशियाँ लाते।

मिलती हमको सीख,बाँट कर खुशी मनाते।।



बचपन का जो बीत, समय फिर इसको लाते ।

करनी है अब प्रीत, सदा मिल कर हम गाते ।।


ढूढ़े हम हर रोज,कहाँ है गुल्लक मेरी ।

 खुशियाँ दी है बाँट, सजे अधरों   पर तेरी।।


कटुता में है नही ,लाभ सबको बतलाते।

गुल्लक से कर प्रीत, तभी सब खुशियाँ पाते।।


पूनम शुक्ला

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