कुकुभ छंद गन्धर्व सेन की दुहिता

 सुधारोपरांत


आज का अभ्यास कुकुभ छन्द

कुकुभ छंद


गन्धर्व सेन की दुहिता थी, वीर रतन की पटरानी।

 सुनी शौर्य की गाथाएँ हैं,लगती जानी पहचानी।।


 चित्तौड़गढ़ के नृप रतन थे , जिनकी थी तेरह रानी,

 पहुँचे पद्मिनी स्वयंवर में, आये बनकर अभिमानी।।


रतन सिंह को प्रिय पद्मिनी,  सुंदरतम है यह नारी।

 साहस बल की धनी बहुत वह, शौर्य भरी सब पर भारी।।


सुनी पद्मिनी की सुंदरता ,खिलजी का मन भरमाया ।

 बेचैन  हुआ ख़िलजी का मन , विधि के हैं क्या मन भाया।


दुर्दांत आततायी ख़िलजी , ने सुनी जब रूप गाथा।

कैसे मिले पद्मिनी मुझको, ठनका उसका तब माथा।।


 सुना रतन को बंदी हैं अब,रानी ने  प्रण  कर डाला।

 *जौहर कर भस्म हुई रानी* ,हुआ  मुगल का मुँह काला ।।


*सुनी  पदमिनी जौहर गाथा* ,परिचित सबकी प्रिय रानी ।

गयी गोद में अग्निदेव की ,ओढ़े चूनर अब धानी ।।


पूनम शुक्ला

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