सार छंद खाकर माखन मिश्री

 सार छंद  


खाकर माखन मिश्री कान्हा,बाबा  को बतलाते ।

सवा लाख है तेरी गैया, माखन हम ना पाते ।।


स्वयं करूंगा दुष्टों का वध, ऐसे कैसे कह दूँ ,

मार पूतना पटक पटक कर ,किला सभी का ढ़ह दूँ।।


 दूध दही औ माखन देती , सबसे अच्छी मइया।

 नित नित लाड़ लड़ाते रहते ,जो है मेरे भइया।।


खास दिवस था गया चराने, अपनी प्यारी गैया ।

लीला थी कुछ मन में उनके, करनी ता ता थैया।।


खेलें  गेंद आज हम मिलकर, कान्हा यूँ समझाते।

 करते मस्ती नदी किनारे, घर पर नहीं बताते।।


 खेल खेल में गेंद गई अब, उनकी यमुना जल में ।

भेज दिया अब कंदुक लाने ,सब ने मिलकर छल में ।


गई सूचना घर पर उनके ,मां बाबा सब आएँ।

कालनाग को वश में करके, कन्दुक कान्हा लाएँ ।।


पूनम शुक्ला

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