*आदर्श शिक्षक*.... जो कुछ भी सिखाये वह शिक्षक है । जो साक्षर बनाये वह शिक्षक है ।जो किसी स्थिति , घटना या प्रवेश को समझने योग्य बनाये वह शिक्षक है ।जो दुनियादारी को समझने में सहायता करे वह शिक्षक है ।लेकिन जो सदमार्ग दिखाए ,जो सात्विक आचरण सिखाये ,जो शिष्य के जीवन की चिंता करें उसके चरित्र को चिन्ता करे ,जो देश हित मे मानवता के हित की राह पर अग्रसर करे वही तो गुरु है ,वही आदर्श शिक्षक है और सच्चा मार्ग दर्शक है । शिक्षक वह होते हैं जो अपनी ज्ञान की ज्योति से हमें प्रकाशित करते हैं और हमारा मार्गदर्शन करते हैं। यह किसी भी आयु वर्ग के लोग हो सकते हैंऔर इनका हमारे जीवन को सफल बनाने में बहुत बड़ा योगदान होता है। इतिहास में जितने भी महान पुरुष हुए है सभी अपने शिक्षकों को याद करना नही भूलते है । धरती पर मनुष्य जब आया तो उसे भगवान का बोध नहीं था, वह गुरु ही है जिसने मनुष्य को भगवान से अवगत कराया। इस लिये पहले गुरु की पूजा की जाती है और उसके बाद भगवान की। हमारे हिंदू मान्यताओं में शिक्षक को भगवान से भी उपर माना जाता है। किसी भी समाज को विकसित करने के लिये, यह महत्वपूर्ण है कि वहां के लोग शिक्षित हों और एक शिक्षक ही ऐसे समाज का निर्माण कर सकता है। वे बच्चों को शिक्षित करते हैं मनुष्य चाहे जितना भी बड़ा क्यों न हो जाए, उसे कभी न कभी एक मार्गदर्शक की आवश्यकता जरूर पड़ती है और आपका मार्गदर्शक ही आपका शिक्षक व गुरु है। गुरु की सीमा केवल स्कूली पुस्तकों मात्र तक सीमित नहीं होती, जरूरत पड़ने पर वे सच्चे दोस्त भी बन जाते हैं और आपकी हर प्रकार से सहायता करते हैं ऐसे तो हर वह व्यक्ति शिक्षक कहलाता है जिससे आप कुछ सीखते हैं, चाहे वह आपकी मां ही क्यों न हो। मां किसी भी व्यक्ति की पहली शिक्षक होती है जो उसे चलना, बोलना जैसी मूलभूत आवश्यकताएं सिखाती हैं। अध्यापक वह व्यक्ति है जो आपको स्कूल में शिक्षा देते हैं, गुरु जो जीवन संबधी ज्ञान देते हैं और शिक्षक इन दोनो के मिश्रण को कहते है, जो आवश्यकता पड़ने पर हर प्रकार से आपको अज्ञान के अंधेरे से बाहर निकालते हैं। हम अपने शिक्षकों का जितना भी गुणगान करें कम ही है और छात्रों के जीवन मे उनके स्कूली शिक्षकों का बहुत योगदान होता है। एक अच्छा गुरु सदैव अपने शिष्य को आगे बढ़ने के लिये प्रेरित करता है। हमें सदैव अपने गुरु का आदर करना चाहिये और सच्चे मायनों मे गुरु का आदर तभी हो सकता है, जब हम उनके बताए गए मार्ग पर चलें। एक शिक्षक होना बहुत कठिन कार्य है और नमन है कुछ लोग जो शिक्षक का पेशा चुनते हैं वाकई में काबिले तारीफ होते हैं। जो अपने कंधों पर देश का भविष्य संवारने का दायित्व लेकर चलते हैं। प्रश्न उठता है हम पांच सितम्बर को ही शिक्षक दिवस के रूप में क्यों मनाते है?इसका उत्तर यही है कि जब डा. सर्वपल्ली राधाकूष्णन जी सन् 1962 में देश के राष्ट्रपति पद पर सुशोभित हुये तो उनके छात्रों एवं मित्रों ने उनसे उनका जन्म दिन मनाने की अनुमति माॅंगी । वह एक दर्शन शास्त्री थे जो दर्शन शास्त्र के प्राध्यापक के रूप में मद्रास प्रेसिडेंसी कालेज ,मैसूर यूनिवर्सिटी,कलकत्ता यूनिवर्सिटी और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पढ़ाया ।उनके जैसा ज्ञानी विद्वान दार्शनिक बड़ी मुश्किल से होते हैं ।ज्ञान के विपुल भंडार , उन्होंने अपना जन्म दिन सभी विद्यालयों में शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की अनुमति प्रदान की ।तभी से पांच सितम्बर 1962 से इस दिवस को सभी विद्यालयों में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा । उनके अनुसार व्यक्ति के जीवन में माता पिता के पश्चात शिक्षक का ही वह स्थान होता है जो अपने छात्र को सही और गलत के बीच का अंतर स्पष्ट करते हुये उसे मार्ग दिखलाता है । वह उनके अंतस के अज्ञान के अन्धकार को नष्ट कर ज्ञान का दीप प्रज्वलित कर आत्म दीपोभव का ज्ञान देकर जीवन को जीने की कला सिखलाता है । आदर्श शिक्षक स्वयं का हित नही देखता । उसका लक्ष्य , उसका केंद्र ,उसका ध्यान सब कुछ विद्यार्थी होता है । एक आदर्श गुरु ही युग का निर्माण कर सकता है क्योंकि युगनिर्माण की कठिनाइयों को सहने की शक्ति केवल उसी में होती है जो एक माँ में होती है । एक माँ या एक आदर्श शिक्षक ही अपने शिष्य के विकास से प्रसन्न होता है । आदर्श शिक्षक के शरीर की आभा या कांति इतनी सशक्त होती है कि शिष्य उससे बिना प्रभावित हुए रह ही नही पाता और यह परिणाम शिक्षक के अभ्यास और तप के कारण ही सम्भव है ।जो शिष्य किसी आदर्श शिक्षक से शिक्षा ग्रहण करते है वे ही सर्वपल्ली राधाकृष्णन , महात्मा गांधी , टॉलस्टॉय , रामकृष्ण परमहंस ,विवेकानंद जैसी विश्व प्रसिद्ध हस्तियॉं बनती है । अच्छे शिक्षक के मूलभूत गुण (१) अच्छा शिक्षक वह है जो ताउम्र सीखता रहता है और अपनेछात्रों से भी सीखने में परहेज नही करता । (२) पुस्तकें वह साधन हैं जिनके माध्यम से हम विभिन्न संस्कृतियों के बीच पुल का निर्माण कर सकते हैं । (३)शिक्षा का परिणाम एक मुक्त रचनात्मक व्यक्ति होना चाहिए जो ऐतिहासिक परिस्थितियों और प्राकृतिक आपदाओं के विरुद्ध लड़ सके । (४) भगवान की पूजा नही होती बल्कि उन लोगों की पूजा होती है जो उनके नाम पर बोलने का दावा करते हैं । (५)शिक्षक वह नही जो तथ्यों को जबरन ठूंसे बल्कि शिक्षक वह है जो उन्हें आने वाली चुनौतियों से लड़ने के लिये तैयार करे । (६) खुद की तुलना किसी और से कभी न करें ,क्यों कि भगवान ने आपके जैसा किसी को भी नही बनाया । (७) संगीत सुनकर ज्ञान नहीं मिलता , मंदिर जाकर भगवान नही मिलता ।पत्थर तो इसलिये पूजते हैं लोग ,क्यों कि विश्वास के लिये इंसान नही मिलता । (८ आपके पास जो भी उत्तरदायित्व है उसे समय से पूर्ण करें । (९ जीवन की सबसे बड़ी खुशी उस काम को करने में है ,जिसे लोग कहते हैं कि यह तुम्हारे बस का नहीं ।चुनौती स्वीकार कर आगे बढ़ो । (१०) इंसान को निखारने के लिये कठिनाइयों की आवश्यकता होती है क्यों कि सफलता का आनंद उठाने के लिए मुसीबत उठानी ही पड़ती है
*आदर्श शिक्षक*....
जो कुछ भी सिखाये वह शिक्षक है । जो साक्षर बनाये वह शिक्षक है ।जो किसी स्थिति , घटना या प्रवेश को समझने योग्य बनाये वह शिक्षक है ।जो दुनियादारी को समझने में सहायता करे वह शिक्षक है ।लेकिन जो सदमार्ग दिखाए ,जो सात्विक आचरण सिखाये ,जो शिष्य के जीवन की चिंता करें उसके चरित्र को चिन्ता करे ,जो देश हित मे मानवता के हित की राह पर अग्रसर करे वही तो गुरु है ,वही आदर्श शिक्षक है और सच्चा मार्ग दर्शक है ।
शिक्षक वह होते हैं जो अपनी ज्ञान की ज्योति से हमें प्रकाशित करते हैं और हमारा मार्गदर्शन करते हैं। यह किसी भी आयु वर्ग के लोग हो सकते हैंऔर इनका हमारे जीवन को सफल बनाने में बहुत बड़ा योगदान होता है। इतिहास में जितने भी महान पुरुष हुए है सभी अपने शिक्षकों को याद करना नही भूलते है ।
धरती पर मनुष्य जब आया तो उसे भगवान का बोध नहीं था, वह गुरु ही है जिसने मनुष्य को भगवान से अवगत कराया। इस लिये पहले गुरु की पूजा की जाती है और उसके बाद भगवान की। हमारे हिंदू मान्यताओं में शिक्षक को भगवान से भी उपर माना जाता है।
किसी भी समाज को विकसित करने के लिये, यह महत्वपूर्ण है कि वहां के लोग शिक्षित हों और एक शिक्षक ही ऐसे समाज का निर्माण कर सकता है। वे बच्चों को शिक्षित करते हैं
मनुष्य चाहे जितना भी बड़ा क्यों न हो जाए, उसे कभी न कभी एक मार्गदर्शक की आवश्यकता जरूर पड़ती है और आपका मार्गदर्शक ही आपका शिक्षक व गुरु है। गुरु की सीमा केवल स्कूली पुस्तकों मात्र तक सीमित नहीं होती, जरूरत पड़ने पर वे सच्चे दोस्त भी बन जाते हैं और आपकी हर प्रकार से सहायता करते हैं
ऐसे तो हर वह व्यक्ति शिक्षक कहलाता है जिससे आप कुछ सीखते हैं, चाहे वह आपकी मां ही क्यों न हो। मां किसी भी व्यक्ति की पहली शिक्षक होती है जो उसे चलना, बोलना जैसी मूलभूत आवश्यकताएं सिखाती हैं। अध्यापक वह व्यक्ति है जो आपको स्कूल में शिक्षा देते हैं, गुरु जो जीवन संबधी ज्ञान देते हैं और शिक्षक इन दोनो के मिश्रण को कहते है, जो आवश्यकता पड़ने पर हर प्रकार से आपको अज्ञान के अंधेरे से बाहर निकालते हैं।
हम अपने शिक्षकों का जितना भी गुणगान करें कम ही है और छात्रों के जीवन मे उनके स्कूली शिक्षकों का बहुत योगदान होता है।
एक अच्छा गुरु सदैव अपने शिष्य को आगे बढ़ने के लिये प्रेरित करता है। हमें सदैव अपने गुरु का आदर करना चाहिये और सच्चे मायनों मे गुरु का आदर तभी हो सकता है, जब हम उनके बताए गए मार्ग पर चलें। एक शिक्षक होना बहुत कठिन कार्य है और नमन है कुछ लोग जो शिक्षक का पेशा चुनते हैं वाकई में काबिले तारीफ होते हैं। जो अपने कंधों पर देश का भविष्य संवारने का दायित्व लेकर चलते हैं।
प्रश्न उठता है हम पांच सितम्बर को ही शिक्षक दिवस के रूप में क्यों मनाते है?इसका उत्तर यही है कि जब डा. सर्वपल्ली राधाकूष्णन जी सन् 1962 में देश के राष्ट्रपति पद पर सुशोभित हुये तो उनके छात्रों एवं मित्रों ने उनसे उनका जन्म दिन मनाने की अनुमति माॅंगी । वह एक दर्शन शास्त्री थे जो दर्शन शास्त्र के प्राध्यापक के रूप में मद्रास प्रेसिडेंसी कालेज ,मैसूर यूनिवर्सिटी,कलकत्ता यूनिवर्सिटी और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पढ़ाया ।उनके जैसा ज्ञानी विद्वान दार्शनिक बड़ी मुश्किल से होते हैं ।ज्ञान के विपुल भंडार ,
उन्होंने अपना जन्म दिन सभी विद्यालयों में शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की अनुमति प्रदान की ।तभी से पांच सितम्बर 1962 से इस दिवस को सभी विद्यालयों में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा ।
उनके अनुसार व्यक्ति के जीवन में माता पिता के पश्चात शिक्षक का ही वह स्थान होता है जो अपने छात्र को सही और गलत के बीच का अंतर स्पष्ट करते हुये उसे मार्ग दिखलाता है । वह उनके अंतस के अज्ञान के अन्धकार को नष्ट कर ज्ञान का दीप प्रज्वलित कर आत्म दीपोभव का ज्ञान देकर जीवन को जीने की कला सिखलाता है ।
आदर्श शिक्षक स्वयं का हित नही देखता । उसका लक्ष्य , उसका केंद्र ,उसका ध्यान सब कुछ विद्यार्थी होता है ।
एक आदर्श गुरु ही युग का निर्माण कर सकता है क्योंकि युगनिर्माण की कठिनाइयों को सहने की शक्ति केवल उसी में होती है जो एक माँ में होती है । एक माँ या एक आदर्श शिक्षक ही अपने शिष्य के विकास से प्रसन्न होता है ।
आदर्श शिक्षक के शरीर की आभा या कांति इतनी सशक्त होती है कि शिष्य उससे बिना प्रभावित हुए रह ही नही पाता और यह परिणाम शिक्षक के अभ्यास और तप के कारण ही सम्भव है ।जो शिष्य किसी आदर्श शिक्षक से शिक्षा ग्रहण करते है वे ही सर्वपल्ली राधाकृष्णन , महात्मा गांधी , टॉलस्टॉय , रामकृष्ण परमहंस ,विवेकानंद जैसी विश्व प्रसिद्ध हस्तियॉं बनती है ।
अच्छे शिक्षक के मूलभूत गुण
(१) अच्छा शिक्षक वह है जो ताउम्र सीखता रहता है और अपनेछात्रों से भी सीखने में परहेज नही करता ।
(२) पुस्तकें वह साधन हैं जिनके माध्यम से हम विभिन्न संस्कृतियों के बीच पुल का निर्माण कर सकते हैं ।
(३)शिक्षा का परिणाम एक मुक्त रचनात्मक व्यक्ति होना चाहिए जो ऐतिहासिक परिस्थितियों और प्राकृतिक आपदाओं के विरुद्ध लड़ सके ।
(४) भगवान की पूजा नही होती बल्कि उन लोगों की पूजा होती है जो उनके नाम पर बोलने का दावा करते हैं ।
(५)शिक्षक वह नही जो तथ्यों को जबरन ठूंसे बल्कि शिक्षक वह है जो उन्हें आने वाली चुनौतियों से लड़ने के लिये तैयार करे ।
(६) खुद की तुलना किसी और से कभी न करें ,क्यों कि भगवान ने आपके जैसा किसी को भी नही बनाया ।
(७) संगीत सुनकर ज्ञान नहीं मिलता , मंदिर जाकर भगवान नही मिलता ।पत्थर तो इसलिये पूजते हैं लोग ,क्यों कि विश्वास के लिये इंसान नही मिलता ।
(८ आपके पास जो भी उत्तरदायित्व है उसे समय से पूर्ण करें ।
(९ जीवन की सबसे बड़ी खुशी उस काम को करने में है ,जिसे लोग कहते हैं कि यह तुम्हारे बस का नहीं ।चुनौती स्वीकार कर आगे बढ़ो ।
(१०) इंसान को निखारने के लिये कठिनाइयों की आवश्यकता होती है क्यों कि सफलता का आनंद उठाने के लिए मुसीबत उठानी ही पड़ती है ।
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