तांटक छंद महाराणा प्रताप

 

तांटक छंद  महाराणा प्रताप



कुंभलगढ़ को किया सुशोभित, नाम मनोहर था काकी ।

 राणा सांगा के  ये वंशज, राज्य सनातन था बाकी।।


 काल मुगल था जन्मा जब वह, अंधकार हरने आया।

 धन्य हुआ राणा का वंशज, उजियारा करने आया।।


 एक लिंग का भक्त निडर था, लालच में वह ना आया।

* *साहस का पर्याय बना वह ,नाम अमरता हाँ पाया*।।


एकलिंग भगवान शपथ ली,अकबर बात न मानेंगें।

आयें कितने भी संदेशा ,तोपे तो हम तानेंगे।।


 बरछी ढाल कटार साथ में ,रुख पवन ओर मोड़ा था।

मुगलों में विध्वंस मचाया, चेतक चंचल घोड़ा था।।


 

 उदय सिंह ने छोटे बेटे, को युवराज बनाया था ।

वीर मराठी भक्तों ने अब ,ना दिल से अपनाया था।।


होनी होती बलवान बड़ी ,राणा ताज दिलाया था,

जगमल भूल चुके राणा थे,वह ना कभी भुलाया था।।


हल्दीघाटी युद्ध छिड़ा जब ,चेतक संग निराला था ।

*एक लाख सेना मुगलों की,  राणा से  अब पाला था* ।।



अद्भुत साहस शौर्य अनोखा, राजपूत अभिमानी था ।

पहन मुकुट धरा छत्र मस्तक, मानसिंह बलिदानी था।।


 मुगलों की मैदानी तोपे ,रण में ही जब बोली थी।

 वीर मराठा राणा की तो, नहीं संग अब टोली थी।।



*घास रोटी बना जंगल में*,खाकर दिवस गुजारे थे।

 गौरव सूर्य  अडिग राणा ने, भारत भाग्य सँवारे थे।।



भामाशाह का पाकर साथ, मुगलों को ललकारा था। 

*तुर्को की बर्बर सेना को*

 *रण में गिन गिन मारा था* ।।



 कुंभलगढ़ पर कब्जा करके, वापस रौनक पाई थी।

 हरा मुगलिया सेना को तब,शान लौट कर आई थी।।


 भारत माँ का शेर लाड़ला, सचमुच बहुत दुलारा है।

ऐसे वीर प्रताप  शिवा को,शत शत नमन हमारा है।।



पूनम शुक्ला


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