हास्य रस दोहे
सत्रह का मैं हो गया, लंबा जैसे तार।
अब माँ तुमसे क्या कहूँ ,ला दो सुन्दर नार।।
पढ़ना अब भाता नही, देख सभी का हाल।
पत्नी की हो नौकरी,बदले मेरी चाल।।
काम काज करता नही ,दूल्हा दियो बनाय।
मोटी दौलत मांग के,घर भी लिया बसाय।।
साली ऐसी है मिली,जैसे बेला फूल।
गोभी जैसा तन दिखे, मन से बीबी शूल।।
पढ़ लिख कर मैं क्या करूँ ,नेता लागे नीक।
पैसा अब मिलता रहे,काम भला तकनीक।।
चार चार हो गाड़ियां, सेवक हो दस बीस,
पीकर प्याला सोमरस, माँगा करते फीस।।
नेता घर में हो अगर,मानो तुम
उपकार।
देकर प्रभु को घूस तुम,करना बेड़ा पार।।
पूनम शुक्ला
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