मनहरण घनाक्षरी खिल उठा आज मन
मनहरण घनाक्षरी
खिल उठा आज मन, नव पात आज वन ,
नूतन सवेरा देख,
धरा आज खिले रे ।।
हरियाली चहुँओर, सौम्य दिखे नव भोर,
कूजती कोकिल डाल,
दूर सभी गिले रे।।
पल्लवित तरु लता, भानु अब बता पता,
नगर नगर जन ,
देखो कैसे मिले रे।।
भाद्रपद बदरिया, रस बरसा फुइयाँ ,
देख मेघ अतिशय,
पात पात हिले रे।।
पूनम शुक्ला
क्रमांक 26
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