कुकुभ छंद राजस्थानी मिट्टी
कुकुभ छंद
राजस्थानी मिट्टी पावन, रानी का है जयकारा ।
सोलह हजार क्षत्राणी का,विधि ने विधान कब टारा।।
चेतन राघव चित्रकार था,खिलजी को तब बतलाया।
रतन सिंह की रानी सुंदर,बिंब उसे है दिखलाया।।
रानी को पाने को आतुर ,जोर लगाया अब सारा ।
राजस्थानी मिट्टी पावन,रानी का है जय कारा।।
चाल चली तब खिलजी ने इक, रतन सिंह से है यह बोला,
रानी कितनी सुंदर है यह,दर्शन को है मन डोला ।
सुनते ही यह रतन सिंह का ,चढ़ा भयंकर अब पारा ,
राजस्थानी मिट्टी पावन, रानी का है जयकारा।।
धोखे से है खिलजी ने तब ,रतन सिंह को पकड़ा था ,
और पद्मिनी पाने को तब, जाल बुना बन मकड़ा था।
बुद्धि बल की स्वामिनी रानी, बन चंडी किया किनारा। राजस्थानी मिट्टी पावन, रानी का है जय कारा ।।
देशभक्त दो गोरा बादल, बन भटक रहे बनवासी।
राजस्थान की रक्षा खातिर, पहुंची जैसे बन दासी।
हाथ जोड़कर विनती कर ली,पाना है अब छुटकारा,
राजस्थानी मिट्टी पावन रानी का है जयकारा।।
देशभक्ति की ज्वाला दिल में ,धधके मन में अब शोला,*मातृ भूमि की रक्षा खातिर,पहना है पावक चोला*।
*देना साथ बहन का अब तो ,गोरा का अब प्रतिकारा* ।।
राजस्थानी मिट्टी पावन ,रानी का है जय कारा।।
किया युद्ध ख़िलजी ने जमकर, बाल न बांका कर पाया,
देख पदमिनी किया इरादा,
पानी है जीवित काया।
*किया प्रवेश अग्नि में रानी, माना विधि का उपकारा*
राजस्थानी मिट्टी पावन,रानी का है जय कारा।।
पूनम शुक्ला
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