नमन मंच सरसी छंद


साइकिल की वे मधुर यादें, भूलूँ न किसी हाल।

बड़े ठाठ का वाहन मेरा, बदली मेरी चाल।।

सन अस्सी का दिवस मनोरम, आया सुंदर याद।

 बैठ साइकिल पढ़ने जाते, घंटी लगती नाद।।


लाख टके की गाड़ी परअब, आती ना वह बात ।

 हमने पैसा जोड़ खरीदी, प्यारी सी सौगात।।

स्वस्थ अगर रहना है हमको, करना है अभ्यास।

जिम में जाकर बहे पसीना, आता हमको रास।।


 मजबूत बनानी देह अगर, करो नेक तुम काम।

तीस मिनट तुम बैठ साइकिल, घूमो प्रतिदिन शाम।।

देख साइकिल झूमा करते, करते हम अभिमान।

 फूल शान से कुप्पा होते, कम समझो  ना शान।।


 जाना हो कॉलेज समय से ,जाना हो बाजार ।

सही समय पर हमें पहुँचाती, गति जैसे हो कार।।

दो पहियों की होती सुन्दर, बैठे एक सवार।

 आगे निकले भीड़ भाड़ में, होती कभी न हार।।



शाही सवार हूँ मैं इसका, चलता मेरा काज।

 ना चाहिए पेट्रोल-डीजल, करते इस पर राज ।।

वायु प्रदूषण रोका करती, ले मारुत का भार ।

धन की यह बर्बादी रोके ,नहीं चाहिए कार।।


पूनम शुक्ला



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