माँ जगदम्बा
नवरातों की पावन बेला, माँ जगदम्बा आयीं हैं।
आज सजा लो द्वार फूल से,आशीष ढेर सा लायीं है ।।
चाहे कैसे भी तुम पूजो ,कृपा सदा माँ बरसाती है।
पहन चुनरिया लाल रंग की,कैसे सबको हरषाती है।
मंदिर पर बैठी यह भक्तन ,अब गीत भाव से गायीं है।
आज सजा लो द्वार फूल से, आशीष ढ़ेर सा लायी है।।
प्रथम मात विराजे शिखर पर, यह शैलपुत्री कहलाती है।
कर आराधन मां दुर्गे का,सिंहो सवार को आती है।
शुक्ल पाख आश्विन में सुंदर,माँ मूरत नैनन भाई है।
आज सजा लो द्वार फूल से आशीष ढ़ेर सा लायीं हैं।।
दूजी माता ब्रह्मचारिणी ,यह सब का दुख हर लेती है ।
निर्मल मन परिपूता देवी, सुख शांति तोष सब देती हैं ।
सकल विश्व में हो नित पूजा, सज देव लोक से आयीं हैं।
आज सजा लो द्वार फूल से, आशीष ढ़ेर सा लायीं हैं।।
पूनम शुक्ला
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