चौपाई छंद मुखौटा


छद्मवेश  ना हमको भाया।  

पहन मुखौटा क्यों दिखलाया।।

रुप दिखाएं नर और नारी ।

धोखा खाती जनता सारी।।



कष्ट मयी है  जीवन सबका।

 ज्यादा दुखी बीच का तबका।।

 पहन मुखौटा शान दिखाते।

किससे दुखड़ा आप छिपाते।।



कहने से हल निकले भाई ।

बने हुए हो क्यों हरजाई।।

मित्र संग हो समय बिताते।

 क्यों ना दुखड़ा उन्हें बताते।।


 अच्छा दिखना हर इक चाहे।

 दुष्कर करदे सबकी राहें।।।।

नकली का तुम ओढ़ लबादा।

पूरा कैसे करते वादा।।



खुश होने का नाटक करते।

पहन मुखौटा पीछे रोते।।

सतपथ पर तुम चलते रहना।

भले विपत्ति बहुत हो सहना ।।



जानवरों के पहन मुखौटे।

 करके नाटक घर को लौटे।।

खेले इससे बच्ची बच्चे ।

होते देखो मन के सच्चे।।


पूनम शुक्ला

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