श्रृंगार छंद
एक थे सेठ बड़े चालाक,
बड़े से नेत्र तनिक सी नाक।
किलो के कान पेट तंदूर,
खौफ ना कोई मद में चूर।।
अन्न को खाकर खुलती आँख,
चमकती फूलों की हो पाँख।
यही बस करता सोच विचार,
कहाँ से रुपये मिले हजार ।।
नगर में घूमा करते चोर ,
सदन में नेता करते शोर ।
धनी बन घूमे मूँछे ऐठ,
बोलकर कहते सब है सेठ।।
सेठ का बिगड़ गया है लाल,
देखकर हाल हुआ बेहाल।
सेठ ने मारे हैं दो हाथ ,
लाल ने छोड़ दिया अब साथ ।।
भीख भी मिलना ना आसान,
करो ना रोटी का अपमान
छोड़कर गलत काम को आज,
किया अब अपने दिल पर राज।।
पूनम शुक्ला
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