कहानी पार्ट 1
कहानी घर घर की
"अरे वाह बहुत खूबसूरत है आपका बेटा " इस बात को सुनते सुनते पूरे 28 साल हो गए थे। सुंदर बहू लाना जोड़ अच्छा बनना चाहिए। पैसों के चक्कर में कोई ऐसी वैसी मत ले आना। दहेज के लालच में मत फ़सना। ऐसी बातें सुन सुनकर नंदा तो बहू के सत्संगी सपनों में अक्सर खो जाया करती थी । उसके पैरों की पायल, हाथों में लाल लाल चूड़ियां, माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी ,पैरों में महावर लगाकर आंगन में छन छन कर चलती हुई बहू की कल्पना तो मानो नंदा चौबीसों घंटे करती थी । दोनों भाई भी जब तक खूब हंसी मजाक करते थे। बहन तो थी ही नहीं। दोनों एक दूसरे के भाई बहन सब कुछ थे ।रक्षाबंधन पर एक दूसरे को राखी बांध दिया करते थे। दोनों भाई खूब प्यार से रहते थे ।जन्मदिन पर या नंदा के वैवाहिक वर्षगांठ पर खुद ही बाहर जाकर पार्टी प्लान कर लिया करते थे ।इस तरह घर के चारों सदस्य ईश्वर का आशीर्वाद मानकर खुशनुमा जिंदगी गुजार रहे थे ।पर नंदा के मस्तिष्क में बहू का ख्याल निकलता ही नहीं था ।वह अपने बेटे राजन के लिए एक पढ़ी-लिखी सुशिक्षित सुंदर बहू की तलाश में लगी रहती ।नंदा को भी कम्पनी चाहिए थी जिसके साथ खूब शॉपिंग करे ।पार्लर जा सकें क्योंकि यहाँ पति के साथ जाना उचित नही था। बहुत से परिवार विवाह के लिए आ रहे थे ।पर कट्टर ब्राह्मण परिवार का होने के कारण बिना जन्मपत्री मिलाएं विवाह करना संभव नहीं था ।और बेटे की जन्म पत्री का किसी कन्या से मिलान नहीं हो पा रहा था। यद्यपि राजन के ग्रह बहुत अच्छे थे पर कभी नाड़ी दोष ,कभी मैत्री आड़े आ जाती थी ।
इसी बीच दोपहर का वक्त था । समय 2:00 बजे का रहा होगा । मोबाइल की घंटी बजी ।फोन उठाया उधर से आवाज आई । हम लोग अपनी बेटी के विवाह के सिलसिले में आज आपसे मिलना चाहते हैं ।नंदा ने उन्हें शाम 5:00 बजे का समय दे दिया ।ठीक शाम 5:00 बजे एक 35 या 36 साल का लड़का गेट पर आया ।कॉल बेल की आवाज सुनकर उसको राजन के छोटे भाई सोम ने ड्राइंग रूम में लाकर स्वागत सत्कार किया। उन्होंने अपने मोबाइल से लड़की की फोटो दिखाई और जन्मपत्री का समय, तिथि,और स्थान भी बता दिया ।जन्मपत्री मिलान के लिए तिथि ,दिन, समय,व स्थान का होना ही आवश्यक होता है। फोटो देखते ही सबको पसंद आ गई। क्योंकि इससे पहले कम से कम 50 लड़कियों के फोटो नंदा और सोम निरस्त कर चुके थे। और अब एक नजर में लड़की पसंद आ जाना परिवार के लिए किसी सौगात से कम नहीं थी। लड़की की जन्मपत्री मिलने पर भी कोई परेशानी नहीं हुई।लड़की की जन्मपत्री मिलना और परिवार को लड़की पसंद आ जाना परिवार में वह दिन एक उत्सव की तरह मनाया गया ।राजन दिल्ली में नौकरी करता था । पर सबको विश्वास था कि राजन को भी लड़की जरूर पसंद आ जाएगी। और एक शुभ दिन नंदा राजन सोम और अपने पति के साथ उसके घर लड़की को देखने पहुंच गए ।लड़की शांत भाव से चाय लेकर आई। पास में बैठ गई। उसको देखने के बाद उसे कुछ पूछने का मन में भाव ही नहीं आया लगा कहीं कुछ पूछा उसने ना में उत्तर दे दिया ,तो ठीक नहीं होगा ।नंदा को केवल लड़की ही चाहिए थी ।क्योंकि भगवान का दिया हुआ उसके घर में सब कुछ था ।लड़की एक मध्यम साधारण परिवार की थी। शुभ मुहूर्त देखकर राजन और सौम्या का विवाह हो गया ।नंदा और उसके पति के तो जमीन में पैर ही नहीं पड रहे थे विदाई होकर दोपहर में उसने ससुराल में कदम रखा। बहू के आगमन पर नंदा के परिवार में कढ़ी चावल खिलाने का रिवाज था ।नंदा की छोटी बहन अनु भोजन थाल सजाकर बहू को खिलाने कमरे में गई ।बहु ने कढी को देखकर एकदम से कह दिया कि हम कढ़ी नहीं खाते हैं हमें कढ़ी पसंद नहीं है नंदा की बहन ने कहा कि दूसरी सब्जियां है उससे खाना खा लो । बस कढ़ी कुछ चख लो। पर सौम्या को कढ़ी पसंद नहीं थी। तो उसने चखना भी उचित नहीं समझा । बात आई गई हो गई । नंदा ने उसका कमरा गुलाब के फूलों से सजवाया । दो तीन दिन बाद ही सूट पहनने की फरमाइश की ।नंदा ने सोचा अभी साड़ी पहनने की आदत नहीं है ।धीरे-धीरे सीख जाएगी। पर ऐसा नही हुआ एक बार जो उसने सलवार कुर्ता पहना आज तक उसने साड़ी नहीं पहनी क्योंकि उसको साड़ी पहनना पसंद नहीं है। ज्यादा चूड़ियां, बड़ी बिंदी भी उसे भाती नहीं थी । पायल कभी कभार पहन लेती थी । धीरे-धीरे सभी मेहमान चले गए । परिवार में यही पांच सदस्य रह गए ।आज कल स्कूल बंद थे तो नंदा का अधिकतर समय घर में ही व्यतीत होता था बहू सुबह 7:00 उठती । चाय बनाती ।और वह चुपचाप नंदा के साथ बैठकर चाय पी लेती थी पर आपस मे तो मौन संवाद भी नही होता था ।चाय पीकर अपने कमरे में पढ़ने बैठ जाती थी क्योंकि वह भी नौकरी के लिए प्रयास कर रही थी । नंदा की कोई बेटी नहीं थी वह बहू के रूप में बेटी को पाकर फूली नहीं समा रही थी । बहू ने धीरे-धीरे खाना बनाने का काम अपने हाथ में ले लिया । उसके अतिरिक्त घर की सारी जिम्मेदारी ,सफाई ,साज सज्जा, व्यवस्था का सभी काम नंदा ने ही संभाल रखा था । बहू का एकमात्र वाक्य प्रति दिन उसके कानों में अवश्य पड़ जाता था " मम्मी चाय " ।बस इसके अलावा नंदा की बहू से कोई बात नहीं होती है । और बहू भी व्यस्त रहती थी ।परिवार से अलग होने के बाद एक मोबाइल ही तो उसका सहारा था और मायके वालो से बात करके उसको सहारा भी मिलता होगा । उसके बाद पढ़ाई भी तो करनी थी उसे । धीरे-धीरे नंदा भी अपनी बहू के स्वभाव से अवगत होने लगी थी । उसकी बहू को सारे दिन अपने कमरे में रहना पसंद था । उससे सबके बीच में बैठना पसंद नहीं था ।और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ बात करना भी उसको पसंद नहीं था । उसने तो सोचा था कि उसके घर में बेटी आएगी। । पर ऐसा नहीं हुआ । बहू बहू ही होती है बहू बेटी का स्थान कभी नही ले सकती है । जैसे कि कहा जाता है कि सास कभी माँ नही हो सकती है । उसे बहू चाहिए ना कि खाना बनाने वाली महाराजिन ।महाराजिन तो ₹3000 में उसे आराम से मिल जाती और इतने रुपए नंदा के लिए कोई बड़ी बात नहीं थे ।सो उसको सौम्या के बनाये खाने से भी परेशानी होने लगी ।उसका मानना था कि खाना बहुत प्रसन्नता से एवं सकारात्मक सोच के साथ बनाना चाहिए ।और सौम्या के चेहरे के भाव तो कोई समझ ही नही सकता था ।वह उदास है कि खुश है ।उसको देखकर पता नही लगाया जा सकता था । सो नंदा को सौम्या के हाथ का बना स्वादिष्ट खाना भी रुचिकर नही लगता था । नंदा को आज तक ये समझ नही आया कि जो लड़की दिन भर मोबाइल से बात कर सकती है वह कमरे के बाहर इतना शांत कैसे रह सकती है ।राजन के पिता नंदा को अक्सर समझाते 'तुम क्यों परेशान होती हो । वह शांत स्वभाव की लड़की है उसे बोलना पसंद नहीं है ।कोई बात नहीं तुम्हारे पास बहुत से परिवार जन है ,सहेलियां हैं , सबसे बात तो तुम करती ही हो । एक बहू से बात नही होती तो परेशान होने जैसी कोई बात नही हैं ' उसके सिर से कभी यह बातें उतर जाती थी और कभी समझ में आ जाती थी ।
राजन अब नौकरी के स्थान पर व्यवसाय करने की योजना बना रहा था। सोम दिन भर ऑनलाइन कक्षा में व्यस्त रहता था । उसके पति ऑफिस चले जाते थे नंदा अब अपना सारा समय कविताएं ,कहानी लिखने में व्यतीत करने लगी । राजन इतना समझदार हो गया था कि खुद की वैक्सीन लगवाने माँ के साथ अस्पताल जाता था पर सौम्या के किसी समस्या के लिए सौम्या का इलाज स्वयं ही कराने लगा था इस बात से नंदा खुश थी कि चलो अच्छा हुआ कि बेटा इतना तो समझदार हो गया है । पर उसको लगने लगा था कि कहीं उसके लिए निर्णय में कुछ चूक तो नही हो गयी है ।और यही सोच कर वह दुखी रहने लगी । उसके पति हमेशा समझाते थे ।'जैसा चल रहा है चलने दो तुम'। अगर कुछ भी कहोगी तो दहेज प्रथा के हजारों केस कोर्ट में लंबित पड़े हैं एक तुम्हारा नाम भी जुड़ जाएगा । यद्यपि नंदा भीरू प्रवृत्ति की महिला नहीं थी पर फिर भी परिवार की सुख शांति के लिए चुप रहना ही उचित समझा ।और अपने बनाये घरौंदे को तिल तिल करके बिखरते हुए देखती रही ।इस परिवार विघटन में किसी का दोष नही था पर वैचारिक भिन्नता अलगाव का बहुत बड़ा कारण बन रहा था । पर एक प्रश्न उसके दिमाग मे हमेशा चलता रहता था कि वास्तव में क्या सारी कमियां उसमें ही है और हर बार वह निरुत्तर हो जाती थी ।
Comments
Post a Comment