मत्तगयंद सवैया 1
स्वस्थ रहे तन औ मन केवल , खेल सभी सिखलाय रहे है ।
आज यहाँ जिस को तुम देखत,नाच वहीं नचवाय रहे है ।
जीवन सुंदर खेल बना अब,देवन आस लगाय रहे है।
खेल ख़िलावत है सबको प्रभु ,और कृपा बरसाय रहे है।।
2
भाग्य बड़ा सबसे तुम लेकर ,जन्म लिया वसुधा अब जानो।
श्रेष्ठ बनो तुम नेक बनो जग, में रख मानवता तब मानो।
कर्म करो नित सुंदर-सुंदर, मानव के गुण को पहचानो ।
जीवन भी चलता रहता तब, दोष कभी अपने तुम छानो।।
3
वर्ष नया शुभ हो सबको यह,दामन पुष्प भरे अब दाता।
मंगल काम उजास भरे दिन,कष्ट सभी अब दूर भगाता।
रश्मिरथी रवि संग सजे जग,दर्पण सा मुखड़ा चमकाता।
कर्म करें प्रभु विश्व धरा पर,पाकर सुन्दर लक्ष्य विधाता।।
4
मत्तगयंद सवैय
जन्म मिला इस पावन भू पर,धन्य हुए अब भाग्य हमारे ।
मान लिया जग में सबने अब,जीवन उत्तम राम सहारे ।
पावन निर्मल गंग धरा अब,तारक शोभित अंबर सारे ।
पूनम की विनती सुन राघव,अर्पण जीवन पांव पखारे।।
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