6/12/21 से 11/12/21

मुक्तक

1


कभी दो पल यहां बैठो बुने सपने सुनाने दो।

खुशी में आज हमको भी यहीं गुलशन सजाने दो।

करेंगे आज से  कोशिश  कभी कोई खता ना हो

 गुलाबी ठंड में हमको सृजन के गीत गाने दो।।



2


तपस्या का मिला परिणाम मंदिर अब सजाने दो।

 धरा के राम भक्तों को कभी अपनी सुनाने दो।

 सहे हैं कष्ट धरती पर मगर चुपचाप रहते हैं।

 दिवस है आज उनका भी सृजन के गीत गाने दो।


3


नहीं शिकवा हमें है आज इस गुजरे जमाने से

मिला है क्या बता दो राज हमको   यूँ सताने से

बहुत दिन बाद मिलकर भी नजर क्यूँ फ़ेर ली तुमने 

अगर नगमे नहीं गाने बुलाया क्यों बहाने से


4


घटा संगीत छायी  है तरन्नुम के बजाने से 

मधुर वीणा बजी है आज साजो  के तराने से

फलक से तोड़ तारों  को सजाया प्रेम पथ तुमने 

न आना  था अगर तुमको बुलाया क्यों बहाने से


5


झुका कर आज नजरों को पलक को क्यों भिगाते हो

बुलाना था नहीं दर पर पता फिर क्यों बताते हो

डरे हो क्यों जमाने से अगर देना नहीं धोखा

 बनाकर इस तरह दूरी हमें तुम क्यों सताते हो


6


किया था प्रेम बंशी से अधर पर जो सजाते हो

*लगे हो खूब सुंदर तुम नयन से क्यों रिझाते  हो*

मिलन की आस रे मोहन सदा मन में बसायी है

छुड़ा के हाथ मेरा अब हमें तुम क्यों सताते हो



7


न समझो फूल सा कोमल सभी को यह बताना है

 मिला है जन्म बेटी का नहीं आँसू बहाना है

समझना मत कभी अबला रगो में शौर्य है भारी 

मिली है शक्ति अंबे से जमाने को दिखाना है


8


कभी  दुख  पास  यदि आये जमाने को बताना मत

 खुशी तो बाँट लेंगे सब  मगर दुखड़ा सुनाना मत

 हँसेंगे लोग सब तुम पर नहीं है बाँट ने वाला

भले हो  कष्ट कितना भी मगर  आँसू बहाना मत।।


पूनम शुक्ला

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