सार छंद *सीता स्वयंवर*
सार छंद
*सीता स्वयंवर*
सीता की वह शक्ति देखकर,पिता जनक ने जाना,
दुहिता का वह दिव्य रूप अब,भली भांति पहचाना।।
हुए अचंभित तात जानकी ,सिय धनुष संग खेली ,
शिवजी का वह धनुष दिव्य था, जान गई अलबेली।।
ली प्रतिज्ञा मिथिला नरेश ने, शिव कमान जो तोड़े,
आज उसी के साथ जानकी ,का गठबंधन जोड़ें।
निर्णय लिया स्वयंवर का शुभ ,बजने लगी बधाई,
दूर दूर से भूपति आये,गिनती ना हो पायी।।
पाकर के मिथिलेश निमंत्रण, मुनि वशिष्ट हरषाये ,
मिलते ही सहमति दशरथ की,राम लखन को लाए।।
मात-पिता की आज्ञा पाकर ,जब आये रघुराजा,
हर्षित हुए देव गण सारे, बजे नाद औ बाजा।।
देख राम को उस उपवन में, सिया देख मुस्कायी ,
मन ही मन में प्रण कर डाला,पाने है रघुराई ।।
पूनम शुक्ला
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