हरिगीतिका छंद किसान
हरिगीतिका छंद किसान
जब बाढ़ हो अति की कहीं जब सूखते खलिहान हो ।
तन हानि हो धन हानि हो तुम देव तुल्य किसान हो ।।
तुमने किया जब प्यार माँ हित पूजते नर है सभी ,
उपकार है हम मानते प्रभु दे नहीं विपदा कभी ।।
कुटिया गिरे जब फूस की लपटें उठे जिय में तभी ,
सुख में कटे हर सांस भी शिव नाम जो जपते कभी ।।
दिन-रात पालनहार हो तुम देव तुल्य किसान हो ,
मन से करें हम प्रार्थना जग में नहीं कम मान हो ।।
पूनम शुक्ला
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