कृष्ण मित्र युधिष्ठिर ,

 घनाक्षरी


कृष्ण मित्र युधिष्ठिर ,शांत चित्त् ध्येय स्थिर ,

दुर्योधन संग व्यास ,

स्तुति स्वयं संधि की ।।


अर्जुन कर्तव्य लग्न ,पुरुषार्थ कान्हा मग्न ,

 विपत्ति कर्तव्य कार्य ,

भ्रान्ति उपलब्धि की ।।


संतान द्रुपद नृप , द्रौपदी सुंदर स्वयं,

 दिव्य मित्र कृष्ण प्राप्त,

 कीर्ति अभिवृद्धि की।।


 भीष्म द्रोणाचार्य कृप , शक्ति युद्ध संग सृप ,

 परित्याग दीप्त ध्वजा ,

बुद्धि  निरबुद्धि की ।।


पूनम शुक्ला

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