चपला करे यह गर्जना

 हरिगीतिका छंद  सावन

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चपला करे यह गर्जना नभ ,को लगे  यह गीत सा।

जब बूंद बारिश की पड़े तब ,नेह  हो मन मीत सा।।

बनिता सुहागन सी लगे कर, लाल हो प्रिय नाम के।

टिकली सजी जब लाल मस्तक, बैठना दिल थाम के।।

परिधान भी पहने हरा नव ,चूड़ियां कर में सजे ।

जब छाय सावन मेघ सप्तक, तार  भी मन में बजे।।

पड़ती फुहार चली हवा घन ,भी मनोरम छा गये ।

घनश्याम को घनश्याम ही अब,देखते मन भा गये।। 


पूनम शुक्ला

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