बुद्ध

 पृथ्वी का सौभाग्य था 

जन्मा बालक सिद्धार्थ,

ममतामई वात्सल्य की मूर्ति ,

महामाया जिनकी मात ।।


 हर्षित हुए नगरवासी सब,

 पाकर अपना राजकुमार,

 ढोल नगाड़े बजी बधाई ,

सुंदर गाया मंगलाचार।।


 किया यशोधरा से विवाह,

 उम्र  थी केवल 16 साल, 

राजमहल में बजी बधाई, 

अवतरित हुआ जब नौनिहाल।।


 जीवन में दुख का आभास न था 

कष्टों से कोई सरोकार न था,

राजकुमार सा विलासी जीवन था,

सामने कपिलवस्तु का साम्राज्य था ।।


पनपी विरक्ति बन्धनों को तोड़ दिया,

  बेकसूर मां बेटे को बिलखते छोड़ दिया ,

विधाता का लिखा भला कौन टाल सका,

 दृढ़ निश्चयी चरित्र था सो नाता तोड़ सका ।।


ज्ञान की खोज में पहुंचा गया,

 राज्य था बिहार स्थान था नया,

 वट वृक्ष के नीचे जमाई धुनि,

 सिद्धार्थ की ईश्वर ने भी खूब सुनी।।


 की तपस्या सात रात और सात दिन ,

मिला ज्ञान जो न था इतना आसान ,

बने बुद्ध जिसने सब जाना, 

सुखों के मूल में है दुःखो का खजाना ।।


खोजना था दुख  था ब्रह्मांड सकल,

करना था दुख दूर जो थे दीन दुर्बल ,

सत्य की खोज में भटका वैरागी ,

राजपाट को छोड़ बना था सन्यासी।।


पाया था जन्म पूर्णिमा थी  बैसाख की 

महापरिनिर्वाण और सच्चे ज्ञान की ,

उपदेशों से उनके मानव जीवन बदल गया,

 बुद्ध ने स्थापना की बौद्ध धर्म की।।


 था अंतिम संदेश आत्मदीप बनना होगा ,

तिलिस्मी दुनिया के दुख दर्द को सहना होगा ,

पापी तन का कष्ट देखा न गया,

 ब्रह्म ज्ञान न बौद्ध भिक्षु बना दिया।।

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