सूर्य

 प्रातः वंदन

घनाक्षरी


रवि छाया नभ पर,रश्मि लाया जग पर ,

ताप  तेरा देख कर ,

*दृष्टि झुक जाती है*।।


 गोल तेरा रंग ढंग,उष्ण तेरे अंग अंग ,

 कैसे सहे देव धरा,

 *नहीं ये बताती है*।।


 आया पूर्व चल कर,धीमी नहीं गति कर,

 देख तेरा रौद्र रूप ,

*धरा सकुचाती है*।।


 तूने क्या किया धरा,तब कैसे तचे धरा ,

साची  कहूँ  रवि भाई,

 *गर्मी  ये सताती  है*।।


पूनम शुक्ला

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