सवेरा

 मनहरण घनाक्षरी

सवेरा


प्रात काल की बेला में ,

धूप छांव के खेला में,

खग पंछी उड़े व्योम,

*उड़े छुए नभ को* ।।


  आरती थाल सजाए,

 सुमधुर गान गाए,

 मन मंदिर दीपक ,

*पूजे तेरे संग को*  ।।


भक्ति में ही जीवन है ,

कांटो खिले सुमन है ,

रखें आस्था ईश्वर पे ,

*और पूजे  गंग को*।।


सजे भिन्न भिन्न पुष्प  ,

 जीवन के छांव धूप,

देखा करते हमेशा,

 *तेरे कई रंग को*।।


पूनम शुक्ला

23/6/21

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