प्रकृति

 मनहरण घनाक्षरी

प्रकृति


अवगुण तज कर

 गुण सब धर सर ,

 प्रभु के गुणगान को,

 *अखियाँ तरसती* ।।


 सुंदर विचार धरे ,

नित नए काम करें ,

 जीवन आयाम पर,

 *कामना बलवती* ।।


सूरज  सा तेज रख ,

 माया का बंधन तज,

 धवल परिधान में,

 *चंद्रिका विचरती* ।।


धन्य धान्य पूर्ण धरा ,

अमृत कलश भरा,

 लहलहाती भूमि पे ,

 *फसलें सरसती* ।।


पूनम शुक्ला

22/6/21

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