पानी

 इस वैश्विक महामारी में सबसे अधिक प्रभावित किया है तो केवल प्राण वायु की कमी ने । इससे पहले क्या हमने सोचा था कि हमें सांस लेने के लिए ऑक्सीजन के लिए घंटों इंतजार करना पड़ेगा शायद नहीं ।आज दुनिया में ऑक्सीजन की तरह पानी की भी स्थिति होती जा रही है पानी की बर्बादी को देखकर मन बहुत व्यथित होता है आज इसी पानी पर एक कविता प्रस्तुत है ।


पानी


क्या मेरे बिन , 

तुम रह पाओगे ?

ख्यालों और  ख्वाबों में

मुझ को ही पाओगे।। 

बता देता हूं,

कि मैं कौन  ,

मैं पानी  हूँ।

सुनना चाहते हो मेरी कहानी, 

 मेरी जुबानी, 

सुनके मेरी कहानी ,

बरसेगा आँख से पानी, 

क्यों व्यर्थ बहाते हो मुझको, 

सूख जाएगी धरा ,

पौधा भी क्या रह पायेगा हरा ,

तो क्या रह  पायेगी , 

मेरी तेरी जिंदगानी । 

कह गये सारे ज्ञानी,

मैं हूँ बहता हुआ पानी।। 


तो क्या हुआ,

अगर मै  रंगहीन ,

गंधहीन, 

स्वाद विहीन,

पर फिर भी क्या रह सकते हो ,

मेरे बिना एक पल भी, 

हर रूप में पड़ेगी, 

तुमको मेरी जरूरत,

 समंदर का नीला रंग हो,

या तालाबों का मटमैला ,

बर्फ  सा सफेद हो,

या घास पर   ओस सा, 

मै खेतों और खलिहानों तक ,

गुजर कर आगे बढ़ता जाता हूं। 

और पा लेता हूं,

अपनी मंजिल ,

जो नियत से

 निश्चित निर्धारित थी ।। 


 पर मैं सोचता हूँ ,

कैसे प्यास बुझाओगे , 

यूं ही बर्बाद करके मुझे, 

 क्या मेरा विकल्प ढूंढ़ पाओगे, 

 शायद नहीं  ।। 

वह दिन दूर नहीं, 

 जब लंबी कतारों से लगकर, 

 एक बाल्टी पानी लाओगे, 

 और उस पानी से ,

पूरा दिन बिताओगे । 

या सोचकर शर्म से 

चुल्लू भर पानी में डूब जाओगे ।। 

 


कल्पना करो,

कहां से लाओगे , 

बादलों का नीला पानी , 

खेतों और खलिहानों  का, 

 सुंदर रंग धानी ,

पपीहे की प्यास भी ,

मेघ ही बुझाता है । 

समंदर से ही पानी ,

भाप बन उड़ जाता है। 

 और फिर बन के बदरिया ,

 पर्यावरण बचाता है । 

तो फिर,

 इस बंजर सी धरती पर ,

तुम क्या उगाओगे ,

बूँद बूँद को तुम ,

तरस तो न जाओगे ,

क्या मेरे बिन,

 पल भर भी रह पाओगे।।

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