पिता
पकड़ कर हाथ माँ ने ,
कभी सिखाया था हमें चलना ,
बताया पिता ने हर पल ,
कैसे गिरकर है संभलना ।
कैसे भी हालात हो,
बिन मांगे सब पाया ,
गांठ बांध ली सीख उनकी,
हर स्थिति का करो सामना।।
तपते मरू में तृप्त करता ,
जो पावन समीर था,
बंजर भूमि में स्वर्ण उगाता ,
ये अमृत सा नीर था।
सुरक्षित रखता अपना कुटुंब,
तूफानों को चीर कर,
अपना लहू पसीना देकर ,
लेता घर की पीर हर ।।
आप थे तो फिक्र से ,
न था कोई लेना और देना ,
हम खुद में थे मगन,
काम था केवल सपने सँजोना ।
जिंदगी जिंदादिली का नाम है ,
यही कहते थे आप हरदम,
मिले पिता रूप में सर्वदा,
प्रभु से बस यही कामना।।
गर बचपन में संस्कारों का,
बीजारोपण किया मात ने ,
समाज के हर वर्ग के साथ ,
चलना सिखाया था तात ने ।
आई लाख मुसीबत जीवन में,
नहीं जाना कभी थमना ,
कहना था सही,अपने बोएँ का,
जाना पड़ेगा खुद ही काटने ।।
माँ का कोमल स्पर्श,
पिता की खुरदुरी हथेलियाँ ,
कैसे करते थे ख्वाहिशें पूरी ,
बनी रहती थी पहेलियाँ।
उनका आशीर्वाद था साथ,
तो फीके है सारे प्रसाधन,
थे खुद्दारी की प्रतिमूर्ति ,
करते हम उनका आराधन ।।
पिता के रूप में खुशियाँ,
बसती थी दिलों में हमारे,
थे मां के सुहाग और अपनी,
संतति के पालनहारे ।
विकट परिस्थितियों में भी ,
देखा ना कभी मायूस ,
परिवार के लिए समर्पित,
मेरे पापा थे सबसे न्यारे ।।
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