सफ़र

 छन्द : *मनहरण घनाक्षरी!*

[8,8,8,7 पर यति


चले थे सफर पर 

न जाने कुछ सोचा था

 भागम भाग सी दौड़ 

*स्वप्न कहीं खो गए* ।।



 पकड़ कर चले थे ,

तुम साथ निभाने को ,

करके मोहब्बत यूं ,

*हम तुम्हारे हो गए*।।


सोचा ना कुछ समझा,

 आंख मूंद चल दिए,

 समझ कर आज का ,

*चैन से हम सो गए*।


धोखे और फ़रेब से,

लूट कर मेरा दिल,

 ऐसी क्या मजबूरी ,

*बिन वर्षा रो गए **।।


पूनम शुक्ला

24/6/21

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