मातृ देवो भवः
मातृ देवो भवः
जगत की सभी माताओं को मेरा नमन
मैं तेरे जैसा बनने का
करती हूं रोज प्रयास माँ ,
गिर गिर के संभलती हूं
पाती हूं तेरा अहसास माँ ।।
माँ माँ जपते जपते
थकते न शब्द मेरे ,
उन शब्दों में घुल जाने का
करती हूं नित्य कयास माँ ।।
केवल स्वप्निल अहसास नहीं ,
रोम रोम में बसी मधुर आस है माँ।
सात स्वरों से निकली लहरी ,
सुरमय करदें सारी कायनात माँ।।
निशिदिन सही गलत का अर्थ ,
सलीके से सिखलाती है हर माँ ।
संतति को कड़ी धूप वर्षा से,
स्नेह आंचल से बचाती है माँ ।।
खुद सहकर लू के थपेड़े भी,
प्रेम का सागर बन जाती है माँ,
जग कर गुजारी है कितनी रातें,
और फिर सपने में आ जाती माँ।।
नश्वर संसार का सबसे ,
शाश्वत शब्द है माँ ।
मातृ देवो भव की गूँज से
गुंजायमान है सारा जहाँ माँ।।
मेरी आशा है , विश्वास है
आस्था का प्रवाह है माँ ।
केवल सृजन हारी न समझो ,
आपदा में शीतल बयार है माँ ।।
खून से अभी सिंचित कर
सुंदर जीवन दायिनी है माँ ,
दिन भर करती काम ,
लेती ना तनिक आराम माँ।।
पुष्पों की सुगंध से पुष्पित,
सुगंधित हवा का झोंका है माँ,
वसुधा जैसी पालन हारी ,
बच्चों का सुंदर संसार है माँ ।।
ममता की उज्ज्वल मूरत,
सृष्टि की आधार है माँ ।
पूनम की बिखरी छटा में,
जगमग प्रकाश है माँ ।।
पूनम शुक्ला
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