कविता कैसी रच पाऊँ मैं *


 मधुर ध्वनि से गुंजित होती ,

क्लान्ति दूर कर निर्मल बहती,

 पाहनों  के तोड़ अवरोधों को,

 पथिकों की है प्यास बुझाती। 

चट्टानों से टकराकर भी ,

भागीरथी ना बन पाऊँ मैं,

कविता कैसे रच पाऊँ मैं ।।


छल प्रपंच का आलय प्याली,

 कटुता की है बात निराली,

 अनैतिकता के वर्चस्व ने छोड़ी है छाप ,

हृदय वाटिका में बैठे हैं आस्तीन के सांप ।

राग द्वेष की इस दुनिया में ,

बैरागी ना बन पाऊँ मैं  ,

कविता कैसे रच  पाऊँ मैं ।।


 संस्कारों की शाला नगरी,

 प्रतिमान सृजन को गढ़ने वाली, 

राम कृष्ण से छली हुई है ,

बलिवेदी पर चढ़ी हुई है ।

नारी की इस पीड़ा को ,

साझा कैसे कर पाऊँ मैं,

कविता कैसे रच पाऊँ मैं ।।


 कैसी सुखद सलोनी बेला, 

वीतराग बन मन अलबेला,

 छंद ज्ञान से अज्ञानी मैं,

भावों से हूं सदा शून्य मैं ।

यत्र तत्र वितरण कर भी,

 काव्य सृजन ना कर पाऊँ मैं,

 कविता कैसे रच पाऊँ मैं ।।


पूनम शुक्ला

केंद्रीय विद्यालय पूर्वोत्तर रेलवे बरेली

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