चुनावी रैलियाँ
*चुनावी रैलियाँ*
धूल धूसरित होती ,
ये चुनावी रैलियाँ ।
मतदाताओं की जेब में ,
ठूसीं जाती है थैलियाँ।।
जनाब ,
नोटों की नहीं है थैलियाँ ,
नोटों की होती तो भी सब्र कर लेते ।
दूध मुहें बच्चे के मुंह में ,
अमृत सा दूध उड़ेल देते ।।
छह महीने से फटी धोती ,
निहार रहे हैं मजबूरी में ,
ला देते एक चिकनी धोती ,
और कुछ समय संग बिता लेते।।
बेटी की फीस किताबे बस्ते ,
जूते और न जाने क्या-क्या ।
लाकर दे देते एक लाल फ्रॉक,
बरसों की तमन्ना को पूरी कर देते ।।
मात-पिता के कर्ज को भी था चुकाना ,
उन्हें सारे तीरथ धाम था कराना।
रह रह कर सुनते थे रोज उनके ताने
हर रोज पचासों बनाते थे हम बहाने ।।
पर हाय विधाता ,
जेब में आई काली नीली थैलियाँ ,
क्या फर्क पड़ता है थैलियाँ,
कच्ची हो या पक्की ,
नशीली हो या जहरीली ,
हम तो बस पी के झूमेंगे इनके आगे आगे,
भले करने पड़े हमे कितने ही फाँके ।।
मंदिर सी पूजी जाएंगी उनकी हवेलियाँ,
आजीवन तमगा मिल जाएगा करने को रंगरेलियाँ ।
जीत का सेहरा बंधेगा इनके सर पर,
और सूनी हो जाएगी हमारी गालियाँ।।
झोली उनकी भरी और,
हमारे हाथ खाली के खाली रह गए ,
हाथों की कठपुतली बन,
हम ठगे से ठगे रह गए ।।
राजनेता बन गए अबूझ पहेलियाँ,
और हम देखते रह गए चुनावी रैलियां।।
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