सार छंद
आज सुनाती हूं मैं तुमको,अपने मन की बातें,
कट जाएंगे रस्ते सारे,कुछ हँसते कुछ गाते ।।
बचपन बीता खेलों में था ,नहीं फिक्र थी भारी।
मां के आँगन खेला करते, सुंदर थी वह पारी ।
पढ़ लिख कर हमको बनना था ,राजा की तब रानी ।
नौकर चाकर सेवा करते ,नहीं किसी से सानी।।
जब मन होता गगन चूमते ,जब मन होता सागर।
बीच लहर हम खेला करते, रत्नों की ले गागर ।।
बचपन जाते बीत गयी वो, बचपन की सब बातें।
राजा रानी किस्से अब हम ,सुन सुनकर मुस्काते ।।
परहित जग में काम करो तुम ,अब हमने है ठाना।
दया धर्म तो मूल मंत्र है,मर्म सभी है जाना।।
पूनम शुक्ला
बहुत सुंदर👌👌
बहुत बधाई आपको👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏
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