घनाक्षरी

अवनि गगन तल, दिन  देखो चला ढल

रात घिर आयी अब,

लोरी भी सुनाई हूँ।


जन्म वृथा जाये नहीं, सुख सभी पायें यहीं,

कष्ट सभी हरो प्रभु,

याद भी दिलायी हूँ।


मन उपकार बसे, जीवन कसौटी कसे,

आराध्य साधना कर,

गुरु वत्स पायी हूँ।



पूस की अंधेरी रात, सूझे नही अब हाथ,

दीपक के प्रकाश से,

आभा खूब पायी हूँ।।


पूनम शुक्ला

Comments